मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, October 24, 2015

तय है

बकरियों का रेवड़ जा रहा है
कसाई - बाड़े की तरफ
काली - सफ़ेद
भूरी - चितकबरी
सींग वाली
बिना सींग की
बाँझ - गाभन - दुधारू
बूढी - जवान
सुन्दर मेमने
बकरे भी हैं
दाढ़ी वाले
बिना दाढ़ी के
किसी पर छपा है
कोई पवित्र निशान
समय हाँक रहा है
कसाई बनकर ,
यहाँ सभी कटेंगे
बिना लाड़ - प्यार के
बिना भेदभाव के
सबके गले रेते जायेंगे ।
बकरे नहीं भूले हैं
दाढ़ी और सींगों की धौंस जमाना
जबकि जानते हैं
तय है जान जाना । ~ प्रवेश ~