मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, June 24, 2015

पहाड़

गर्मियों में बहुत भाते हैं पहाड़ |
छुट्टी बिताने लोग आते हैं पहाड़ ||
चमड़ी सुखाती है जब गर्मी शहर की
भूले - बिसरे याद आते हैं पहाड़ ||
देखो कितना बड़ा दिल है इनका
गैरों को भी गले से लगाते हैं पहाड़ ||
चैन - सुकून मुफ्त ही देते हैं
एहसान नहीं जताते हैं पहाड़ ||
मेहमान से लौट जाते हैं फिर से
साल भर के लिए भूल जाते हैं पहाड़ || ~ प्रवेश ~

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (26-06-2015) को "यही छटा है जीवन की...पहली बरसात में" {चर्चा अंक - 2018} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. खूबसूरत सत्य

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  3. सटीक और सामयिक रचना

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