मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, June 24, 2015

भूख को पेट-निकाला !

मैं देखना चाहता हूँ
वह दिन जब
भूख उदर की
दर - दर भटके
उसे खाली न मिले
कोई भी पेट,
जो मिले कहीं
तो व्यवस्था हो
ताकि तुरंत दिया जा सके
भूख को पेट-निकाला !
आप ये न समझें
कि मैं अमर होना चाहता हूँ,
यह आशावादिता है !! ~ प्रवेश~

पहाड़

गर्मियों में बहुत भाते हैं पहाड़ |
छुट्टी बिताने लोग आते हैं पहाड़ ||
चमड़ी सुखाती है जब गर्मी शहर की
भूले - बिसरे याद आते हैं पहाड़ ||
देखो कितना बड़ा दिल है इनका
गैरों को भी गले से लगाते हैं पहाड़ ||
चैन - सुकून मुफ्त ही देते हैं
एहसान नहीं जताते हैं पहाड़ ||
मेहमान से लौट जाते हैं फिर से
साल भर के लिए भूल जाते हैं पहाड़ || ~ प्रवेश ~