मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, December 18, 2015

घबरा मत

घबरा मत .. तिलमिला नहीं ।
तूने जब कुछ किया नहीं ॥

डरना काम है झूठों का ।
सच को किसी ने छुआ नहीं ॥

बोला जो  उघड़ता जायेगा ।
चुप रहा किसी से खुला नहीं ॥

खुद से ज्यादा विश्वास न कर ।
तेरे काम में कोई सगा नहीं ॥

बकती है दुनिया बका करे ।
इससे  काम तो दूजा हुआ नहीं ॥ ~ प्रवेश 

Monday, November 30, 2015

पीछे देखना

पीछे देखना
मोती छोड़ आये तो
बुरा नहीं है। ~प्रवेश~

Saturday, October 24, 2015

तय है

बकरियों का रेवड़ जा रहा है
कसाई - बाड़े की तरफ
काली - सफ़ेद
भूरी - चितकबरी
सींग वाली
बिना सींग की
बाँझ - गाभन - दुधारू
बूढी - जवान
सुन्दर मेमने
बकरे भी हैं
दाढ़ी वाले
बिना दाढ़ी के
किसी पर छपा है
कोई पवित्र निशान
समय हाँक रहा है
कसाई बनकर ,
यहाँ सभी कटेंगे
बिना लाड़ - प्यार के
बिना भेदभाव के
सबके गले रेते जायेंगे ।
बकरे नहीं भूले हैं
दाढ़ी और सींगों की धौंस जमाना
जबकि जानते हैं
तय है जान जाना । ~ प्रवेश ~

Thursday, September 17, 2015

आओ मिलकर गाली दें

नल की टोंटी हुई ख़राब
पानी जाये बेकार
इस बरबादी के लिये
जिम्मेदार सरकार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

कूड़ा फेंकें सड़क पर
बड़े - बड़े होशियार
फिर चिल्लायें लग गया
कूड़े का अंबार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

शीश-कवच पहना नहीं
आ गये टाँके चार
सिर फट जाने के लिये
जिम्मेदार सरकार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

दाएँ - बाएँ देखकर
सड़क नहीं की पार
अनचाहा एक हादसा
कर गयी मोटरकार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

जल्दी - जल्दी के लिये
घूस खिलाते यार
काम निकलते ही कहें
हो गया भ्रष्टाचार ।

आओ मिलकर गाली दें ।

घात लगाये बैठे हैं
कुत्ते - गिद्ध - सियार
घर से जिनको नहीं मिले
कभी भले संस्कार ।

आओ मिलकर गाली दें । ~ प्रवेश ~ 

Tuesday, August 18, 2015

इंसान बना देता है

हमें हमेशा लगता है
कच - कच करने से
बिगड़ जाती है बात
और पानी फेरना भी
इशारा इसी ओर करता है
लेकिन
वो छिड़कता है पानी भी
और करता है कच  - कच
देखते ही देखते
अमानुष को इंसान बना देता  है । ~ प्रवेश ~ 

Wednesday, June 24, 2015

भूख को पेट-निकाला !

मैं देखना चाहता हूँ
वह दिन जब
भूख उदर की
दर - दर भटके
उसे खाली न मिले
कोई भी पेट,
जो मिले कहीं
तो व्यवस्था हो
ताकि तुरंत दिया जा सके
भूख को पेट-निकाला !
आप ये न समझें
कि मैं अमर होना चाहता हूँ,
यह आशावादिता है !! ~ प्रवेश~

पहाड़

गर्मियों में बहुत भाते हैं पहाड़ |
छुट्टी बिताने लोग आते हैं पहाड़ ||
चमड़ी सुखाती है जब गर्मी शहर की
भूले - बिसरे याद आते हैं पहाड़ ||
देखो कितना बड़ा दिल है इनका
गैरों को भी गले से लगाते हैं पहाड़ ||
चैन - सुकून मुफ्त ही देते हैं
एहसान नहीं जताते हैं पहाड़ ||
मेहमान से लौट जाते हैं फिर से
साल भर के लिए भूल जाते हैं पहाड़ || ~ प्रवेश ~

Wednesday, April 29, 2015

मानवता और प्रलय

जब भी कोई मुल्क
आपदा की चपेट में आता है,
मानवता का सबसे पावन 
रूप सामने आता है । 
छोटी - छोटी बातों पर जो 
आँख दिखाता बड़ी - बड़ी, 
तोड़ के सीमा का बंधन, 
पड़ौसी का धर्म निभाता  है । 

मानवता है गुण प्राकृतिक, 
और प्रलय भी प्राकृतिक है । 
प्रलय के जग जाने से 
मानवता जगना स्वाभाविक है । 
ह्रदय और मस्तिष्क परस्पर 
सामंजस्य बिठा लेते हैं, 
मानव का ऐसा चरित्र 
सच्चरित्र है और  नैतिक है । 

मानवता और प्रलय दोनों 
जाति - धर्म को नहीं मानते ,
दोनों ही नक़्शे पर खींची 
रेखाओं को नहीं जानते । 
फिर भी रेखाओं के ऊपर 
रेखाएँ खींचे जाते हैं 
मानवता सो जाती है और 
अब के मानव नहीं मानते । ~ प्रवेश 

Friday, March 27, 2015

तुकबंदी जरूरी है ।

ये ना समझें मजबूरी है,
तुकबंदी जरूरी है ।
आ से आ तुक मिले न मिले
ई से ई भी भले न मिले
किन्तु मिले तुक भावों का
मिले तुक अनुभावों का ।
बात बेतुकी कौन सराहे
कोई सुनना तक न चाहे,
कभी किसी को कहो बेतुका
उसी समय हो धक्का मुक्का । 
तुक मिले ही रचना पूरी है,
तुकबंदी जरूरी है । ~ प्रवेश ~

Tuesday, March 17, 2015

बहती कविता

आइये रचें
बहती हुई कविता
जो आकार ले ले उसी बर्तन का
जिसमें भरना चाहो आप ।
साथ ही बचें
अति बौद्धिकता और अतिवादिता से |
भीगने दो कम्बल, बरसने दो पानी ,
पेड़ों से मछलियों को उतार दो
पानी में आग नहीं लगी है । ~ प्रवेश ~

Tuesday, February 3, 2015

अख़बार पढ़ रहा हूँ

एक लड़के का स्टाइल लड़की को भा रहा है
लड़का खास किस्म का पान मसाला खा रहा है ।
थोड़ी आगे जाकर राशिफल लिखा है
दोस्तों के हाथों मेरा क़त्ल लिखा है ।
बड़ा सा विज्ञापन है, बाल लम्बे - लम्बे हैं
देखने वालों को खूब ही अचम्भे हैं ।
वैवाहिकी में छपे डेढ़ सौ कुँआरे हैं
सर्वगुण सम्पन्न सारे  के सारे हैं ।
मौत सबको आती है, हल्की सी दस्तक है
आज आठ लोगों की तीये की बैठक है ।
एक चित्र केशी है, एक चित्र टकला  है
तेल बहुत सस्ता है, कुछ न कुछ तो घपला है ।
बेरोजगार लोगों का एक अलग पन्ना है
काम खूब करना है, दाम थोड़ा मिलना है ।
गोलियाँ छपी हैं , मर्दानगी बढ़ाने को
दूध कैसे लायेंगे , गोलियों को खाने को !
कहीं एक कोने में बलात्कार की खबर है
दो ही लाइनों में भ्रष्टाचार की खबर है ।
कहीं किसी छक्के पे कोटि - कोटि वारे हैं
कहीं बुलंद सितारों के गर्दिश में सितारे हैं ।
आप ये न सोचें कि यूं ही गढ़ रहा हूँ ।
सच कह रहा हूँ, अख़बार पढ़ रहा हूँ । ~ प्रवेश ~