मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, December 24, 2014

कुहरा छाया हुआ सा है

समझकर चाँद सूरज को
मन भरमाया हुआ सा है ।
आँखों से शुरू होकर
कुहरा छाया हुआ सा है ।

नमी है, गीला - गीला है
खड़े पेड़ों के घेरे में,
शबनम ने इन्हें शब भर
नहलाया हुआ सा है ।

दुबक ख़ामोश बैठे हैं
परिंदे भी घरौंदों में,
सख्तमिज़ाज बाप लौटकर
घर आया हुआ सा है ।

झीने - झीने से परदे से
बचाकर आँख झाँके है,
ये सूरज भी दुल्हनिया सा
शरमाया हुआ सा है ।

जो पीते हैं गरम पानी
पहनते हैं गरम कपड़े,
ये जाड़ा भी उनसे कोई
शह पाया हुआ सा है ।

नन्हे इस्कूली बच्चों से
घर से निकले मजूरों से,
सरहद पर रहते वीरों से
घबराया हुआ सा है । ~ प्रवेश 

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