मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, November 10, 2014

जहाँ पतलून बँधती है , वहीँ कमर नहीं होती ।

जिनकी आँखों पे पट्टी हो,
उनकी सहर नहीं होती ।
चकाचौंध रहती है,
मगर रौशनी भर नहीं होती ॥

बात सलीके की छोड़ो,
बिगड़ी का नाम फैशन है ।
जहाँ पतलून बँधती है ,
वहीँ कमर नहीं होती ॥

बड़े - बूढ़े जो कहते हैं,
वो बात पते की होती है ।
कड़वी ज़रूर होती है
मगर ज़हर नहीं होती ॥

सब खेल पेट का होता है,
हर एक कहानी रोटी की ।
कभी तेरे घर नहीं होती,
कभी मेरे घर नहीं होती ॥

वो भूख मिटाने निकले हैं,
जो केवल मेवे खाते हैं ।
भूखे पिछवाड़े रहते हैं ,
इनको खबर नहीं होती ॥ ~ प्रवेश ~

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