मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, November 8, 2014

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |
एक - एक दिन साल सा लगने लगा है ||
आँखों में सपने कई पलने लगे हैं |
दिल भी सौ - सौ ख़्वाब अब बुनने लगा है ||
मैं लगाये पंख जैसे उड़ रहा हूँ |
साथ में सारा जहां उड़ने लगा है ||
अजनबी तू कौन है, नहीं जानता हूँ |
मगर हर रिश्ते से तू जुड़ने लगा है ||
आ सुनूं तेरी, मैं कुछ अपनी सुनाऊँ |
मेरा मैं अब मुझसे ही लड़ने लगा है || ~ प्रवेश ~

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (09-11-2014) को "स्थापना दिवस उत्तराखण्ड का इतिहास" (चर्चा मंच-1792) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. चर्चा मंच के लिए चयनित होना सम्मान की बात है | सराहना हेतु धन्यवाद श्रीमान |

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  2. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति.... आभार।

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  3. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति.... आभार।

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