मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, November 10, 2014

जहाँ पतलून बँधती है , वहीँ कमर नहीं होती ।

जिनकी आँखों पे पट्टी हो,
उनकी सहर नहीं होती ।
चकाचौंध रहती है,
मगर रौशनी भर नहीं होती ॥

बात सलीके की छोड़ो,
बिगड़ी का नाम फैशन है ।
जहाँ पतलून बँधती है ,
वहीँ कमर नहीं होती ॥

बड़े - बूढ़े जो कहते हैं,
वो बात पते की होती है ।
कड़वी ज़रूर होती है
मगर ज़हर नहीं होती ॥

सब खेल पेट का होता है,
हर एक कहानी रोटी की ।
कभी तेरे घर नहीं होती,
कभी मेरे घर नहीं होती ॥

वो भूख मिटाने निकले हैं,
जो केवल मेवे खाते हैं ।
भूखे पिछवाड़े रहते हैं ,
इनको खबर नहीं होती ॥ ~ प्रवेश ~

Saturday, November 8, 2014

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |
एक - एक दिन साल सा लगने लगा है ||
आँखों में सपने कई पलने लगे हैं |
दिल भी सौ - सौ ख़्वाब अब बुनने लगा है ||
मैं लगाये पंख जैसे उड़ रहा हूँ |
साथ में सारा जहां उड़ने लगा है ||
अजनबी तू कौन है, नहीं जानता हूँ |
मगर हर रिश्ते से तू जुड़ने लगा है ||
आ सुनूं तेरी, मैं कुछ अपनी सुनाऊँ |
मेरा मैं अब मुझसे ही लड़ने लगा है || ~ प्रवेश ~