मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, July 31, 2014

विकास का बाप

अपना अंजाम सोचकर
काँप उठते हैं पहाड़,

दबी आवाज में
बतियाने लगते हैं
बूढ़े दरख़्त,

डर के मारे
दम तोड़ देती हैं
छोटी - छोटी झाड़ियाँ,

चट्टानों को मिर्गी के
दौरे आने लगते हैं,

झाड़ियों के बीच
मुर्गी इंतजार करती है
चूजों के जल्दी बड़े  होने का,

मन  ही मन
विलाप करते हैं लोग
बीच में आते हैं जिनके
खेत - मकान - दुकान
और रोजी का जरिया ,

जब विकास का बाप
अपनी क्रूर चाल से
बढ़ता है पहाड़ों में
सड़कों के नाम पर
सीना चीरने पहाड़ का
और न्यौता देता है
बाढ़ - भूस्खलन के साथ
पहाड़ों के विनाश को । ~ प्रवेश ~


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