मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, May 1, 2014

गिरगिटी अंदाज़ देखना

या तो हाथ आएगी या कुर्सी छूट जाएगी ।
अब दिन - ब- दिन तुम गिरगिटी अंदाज़ देखना ॥  १

फ़ासला कुर्सी तलक घटने लगा है ।
जनाब का बदला हुआ मिज़ाज देखना ॥ २

चुनाव है इसलिए चूल्हे पर पतीली है ।
फिर गगनचुम्बी टमाटर और प्याज देखना ॥ ३

सड़क पर जो जोश में चिल्ला रही है ।
इसी भीड़ की दबी हुई आवाज़ देखना ॥ ४

इसी मौसम में जिन चूजों के पर निकलेंगे ।
पाँच साल में उन परिंदों की परवाज़ देखना॥ ५ 

सियासत में किसी से कुछ छिपा नहीं रहता ।
उफनते - दफ़नते नये राज़ देखना ॥  ६  ~ प्रवेश  ~ 
                        

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