मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, April 18, 2014

मुझमें तू अभी तक है

किताब में दफ़न गुलाब की खुशबू अभी तक है ।
अरसा बीत गया है, मुझमें तू अभी तक है ॥

खेत - खलिहान सब तो नीलाम हो गये ।
झूठी बची मगर आबरू अभी तक है ॥

खिड़की पे दम तोडती हैं ख्वाहिशें वस्ल की ।
तुझसे मिलने की आरजू अभी तक है ॥

ग़ज़ल में अपने जिक्र से हैरान ना होना ।
मेरी कलम में सियाही , रगों में लहू अभी तक है ॥
                                                               ~ प्रवेश ~

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