मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, April 21, 2014

वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक ।

वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक ।
पहुँच पाती है कहाँ कोई योजना मजबूर तक !!

आ गया है खेत तक खादी में लिपटा अजनबी ।
आज उसकी पहुँच जाने क्यों हुई मजदूर तक !!

आज उसको झोंपड़ों की याद फिर से आ गयी ।
आशियाँ जिसका है जन्नत , शाम - ए - मंजिल हूर तक ॥

चूसता है आम कहकर आदमी को ख़ास ही ।
हो गया है आम अब बदनाम से मशहूर तक ॥

कोई जलने के लिए , कोई जलाने के लिए ।
जल रहा है आदमी धूप  से तंदूर तक ॥  ~ प्रवेश ~ 

Friday, April 18, 2014

मुझमें तू अभी तक है

किताब में दफ़न गुलाब की खुशबू अभी तक है ।
अरसा बीत गया है, मुझमें तू अभी तक है ॥

खेत - खलिहान सब तो नीलाम हो गये ।
झूठी बची मगर आबरू अभी तक है ॥

खिड़की पे दम तोडती हैं ख्वाहिशें वस्ल की ।
तुझसे मिलने की आरजू अभी तक है ॥

ग़ज़ल में अपने जिक्र से हैरान ना होना ।
मेरी कलम में सियाही , रगों में लहू अभी तक है ॥
                                                               ~ प्रवेश ~