मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, March 28, 2014

उल्लू बनो

हर पल तुम्हें बनाने की
कोशिश रहती है उनकी
कभी गधा - कभी उल्लू ,
तुम बनते हो पहला 
लदते जाते हो 
चूं - चपड़ नहीं करते 
काटना भी नहीं सीखा 
ना दुलत्ती ही मारते हो 
और वो बनाते रहते हैं। 

कभी दूसरा नहीं बने
बनते तो जान जाते 
कैसे किया जाता है  
रातों में शिकार 
कैसे बिना आवाज किये 
सुनसान में 
लगायी जाती है गश्त 
कैसे डराया जाता है 
बड़ी - बड़ी आँखें दिखाकर
कैसे पंजे में दबाकर
नोंचा जाता है बेबस को।

एक बार उल्लू बनो
फिर गधे नहीं बनोगे
पर याद रखना
फिर उल्लू मत बनाना
औरों को - गधा भी नहीं।
                         ~ प्रवेश ~ 


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