मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, December 30, 2014

नववर्ष मंगलमय हो

पूरब से उग आयेगा
फिर पश्चिम में छिप जायेगा
साँझ ढलेगी फिर वैसे
चंदा नभ में छा जायेगा
फिर ओस गगन से धीरे - धीरे
धरती पर उतरती है
ये भी वैसे ही गुजरेगी
जैसे हर रात गुजरती है,
भूखा, भूखा सो जायेगा
ठण्डा - ठण्डा पानी पीकर
बिन चादर के ठिठुरेगा
मर - मरकर और जी - जीकर,
चंदा - सूरज की साजिश से
फिर इक बार सुबह होगी
फिर हताश आशाओं की
नये दिन से सुलह होगी,
बेरोजगार फिर सड़कों पर
काम तलाशेगा दिन भर
घर से जैसा निकला था
वैसे ही शाम लौटेगा घर,
नया साल बस बदलेगा
कुछ इश्तहार अख़बारों पर
नए कैलेंडर लटकेंगे
घर - दफ्तर की दीवारों पर,
वही पिछला उपदेश सुनो
नित नवकर्म में तन्मय हो
सभी मित्रों - अमित्रों का
नववर्ष मंगलमय हो । ~ प्रवेश ~

Wednesday, December 24, 2014

कुहरा छाया हुआ सा है

समझकर चाँद सूरज को
मन भरमाया हुआ सा है ।
आँखों से शुरू होकर
कुहरा छाया हुआ सा है ।

नमी है, गीला - गीला है
खड़े पेड़ों के घेरे में,
शबनम ने इन्हें शब भर
नहलाया हुआ सा है ।

दुबक ख़ामोश बैठे हैं
परिंदे भी घरौंदों में,
सख्तमिज़ाज बाप लौटकर
घर आया हुआ सा है ।

झीने - झीने से परदे से
बचाकर आँख झाँके है,
ये सूरज भी दुल्हनिया सा
शरमाया हुआ सा है ।

जो पीते हैं गरम पानी
पहनते हैं गरम कपड़े,
ये जाड़ा भी उनसे कोई
शह पाया हुआ सा है ।

नन्हे इस्कूली बच्चों से
घर से निकले मजूरों से,
सरहद पर रहते वीरों से
घबराया हुआ सा है । ~ प्रवेश 

Friday, December 5, 2014

आओ पढ लो मुझे

आओ पढ लो मुझे
जैसे पढी थी बचपन में
दो एक्कम दो
दो दूनी चार,
और कंठस्थ किया था
अ से अनार
आ से आम,
देखो ... देखो
तुम्हें आज भी याद है,
उसी मस्ती और
बेफिक्री से पढो |
देखो वैसे न रटना
जैसे रटे थे
बीजगणित के सूत्र,
मतलब के लिये पढे
पास हुए और भूल गये | ~ प्रवेश ~

Monday, November 10, 2014

जहाँ पतलून बँधती है , वहीँ कमर नहीं होती ।

जिनकी आँखों पे पट्टी हो,
उनकी सहर नहीं होती ।
चकाचौंध रहती है,
मगर रौशनी भर नहीं होती ॥

बात सलीके की छोड़ो,
बिगड़ी का नाम फैशन है ।
जहाँ पतलून बँधती है ,
वहीँ कमर नहीं होती ॥

बड़े - बूढ़े जो कहते हैं,
वो बात पते की होती है ।
कड़वी ज़रूर होती है
मगर ज़हर नहीं होती ॥

सब खेल पेट का होता है,
हर एक कहानी रोटी की ।
कभी तेरे घर नहीं होती,
कभी मेरे घर नहीं होती ॥

वो भूख मिटाने निकले हैं,
जो केवल मेवे खाते हैं ।
भूखे पिछवाड़े रहते हैं ,
इनको खबर नहीं होती ॥ ~ प्रवेश ~

Saturday, November 8, 2014

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |

वक्त फिर कुछ इस तरह कटने लगा है |
एक - एक दिन साल सा लगने लगा है ||
आँखों में सपने कई पलने लगे हैं |
दिल भी सौ - सौ ख़्वाब अब बुनने लगा है ||
मैं लगाये पंख जैसे उड़ रहा हूँ |
साथ में सारा जहां उड़ने लगा है ||
अजनबी तू कौन है, नहीं जानता हूँ |
मगर हर रिश्ते से तू जुड़ने लगा है ||
आ सुनूं तेरी, मैं कुछ अपनी सुनाऊँ |
मेरा मैं अब मुझसे ही लड़ने लगा है || ~ प्रवेश ~

Thursday, October 9, 2014

हम मँझधार में अटके हुए लोग

दाहिने हाथ की तरफ बैठे हुए
भाइयो एवं बहनो
हम मँझधार में अटके हुए लोग
समर्थक हैं आपके
कट्टर समर्थक।

हमारा कर्तव्य है
आपके हर कार्य को
उचित सिद्ध करना
आपके हर वक्तव्य को
प्रासंगिक रूप देना ।

आप तो जानते हैं
आपके लिए हम लगा देते हैं
एड़ी - चोटी का जोर
और सम्पूर्ण बुद्धि कौशल,
ये बायीं ओर वाले
हमें अंधभक्त भी कहते हैं ।

और तुम भी सुन लो
बायीं तरफ खड़े लोगो
क्योंकि हम कट्टर समर्थक हैं
दाहिनी तरफ वालों के
तो इसलिए तुम्हारे सही कदम को भी
गलत साबित करने में
हम वही जी - जान लगाते हैं
जो दाहिनी ओर वालों के
गलत को सही करने में लगाते हैं ।

अब गौर से सुनो
आर -पार वालो
हम मँझधार में हैं
क्योंकि तुम लोग
इस्तेमाल करते हो हमें
अपने पाले बदलने के लिए,
तुम्हारी नौका भर बनकर रह जाते हैं हम
मर - खप  तक जाते हैं तुम्हें पार लगाने में । ~ प्रवेश 

Friday, September 19, 2014

हर बूँद कीमती होती है

हर बूँद कीमती होती है
जब खून पसीना होता है

जी - जी कर मरना होता है
मर - मर के जीना होता है

पल - पल मुश्किल से कटता है
दिन एक महीना होता है

आवाज दफ़न हो जाती है
अश्कों को पीना होता है

वो गलत, गलत नहीं होते
तू  सही, सही ना होता है

सोचो तनिक विचार करो
ये भी कोई जीना होता है ! ~ प्रवेश ~

Tuesday, September 16, 2014

बदलाव

बदलाव के बिना
विकास की यात्रा अधूरी है
आगे बढ़ने के लिए
बदलाव जरूरी है
मगर आज भी बड़ी भूख
छोटी आँत में ही बसती है
तारीखें दीवार पर और
सरकार दिल्ली में बदलती है | ~ प्रवेश ~

Friday, September 5, 2014

किस - किस को नमन करूँ

किस - किस को नमन करूँ
क्यों ना सबको नमन करूँ

माता की उँगली  पकड़कर
धरती पर पग धरना सीखा
और पिता की पकड़ कलाई
स्वछन्द विचरना सीखा

फल से लदी डालियों से
परहित में झुक जाना सीखा
जिस पत्थर ने ठोकर दी
उस पत्थर से रुक जाना सीखा

सागर से सीखा है मैंने
बिना भेद सबको अपनाना
नदियों ने सिखलाया मुझको
सदा निरंतर बहते जाना

चंदा सिखलाता है हम को
सब पर शीतलता बरसाना
सूरज शिक्षा देता  हमको
अंधकार को दूर भगाना

विकट परिस्थिति में खुश रहना
सीखा है मैंने फूलों से
अपनी भूलों से भी सीखा
सीखा औरों की भूलों से

मैं जब पथिक  हो जाता हूँ
सब मार्गदर्शक हो जाते हैं
मैं जब शिष्य बन जाता हूँ
सब तब शिक्षक हो जाते हैं

किस - किस को नमन करूँ
क्यों ना सबको नमन करूँ  । ~ प्रवेश ~ 

Sunday, August 17, 2014

आओ पीठ खुजायें

आओ पीठ खुजायें
आओ पीठ खुजायें
हम सोशल नेटवर्क के बन्दे
ऐसी रस्म निभायें
आओ पीठ खुजायें

तुम मुझको दो लाइक देना
दो मैं तुमको दूँगा
लेन - देन हो खरा- खरा
उधार नहीं रखूँगा
पारदर्शिता अपनायें
आओ पीठ खुजायें -2

तुम मुझको अच्छा कह देना
मैं भी वाह - वाह करूँगा
जितने भी मैं कमेंट करूँ
उतनी ही चाह करूँगा
मिलकर भूख बढ़ायें
आओ पीठ खुजायें -2

तुम जो भी लिख दोगे
कभी न ऊल-जुलूल कहूँगा
मीन-मेख जो ढूँढेगा
उसकी ही भूल कहूँगा
ऐसा सामंजस्य बिठायें
आओ पीठ खुजायें -२

हम सोशल नेटवर्क के बन्दे
ऐसी रस्म निभायें
आओ पीठ खुजायें
आओ पीठ खुजायें | ~ प्रवेश ~

Thursday, July 31, 2014

विकास का बाप

अपना अंजाम सोचकर
काँप उठते हैं पहाड़,

दबी आवाज में
बतियाने लगते हैं
बूढ़े दरख़्त,

डर के मारे
दम तोड़ देती हैं
छोटी - छोटी झाड़ियाँ,

चट्टानों को मिर्गी के
दौरे आने लगते हैं,

झाड़ियों के बीच
मुर्गी इंतजार करती है
चूजों के जल्दी बड़े  होने का,

मन  ही मन
विलाप करते हैं लोग
बीच में आते हैं जिनके
खेत - मकान - दुकान
और रोजी का जरिया ,

जब विकास का बाप
अपनी क्रूर चाल से
बढ़ता है पहाड़ों में
सड़कों के नाम पर
सीना चीरने पहाड़ का
और न्यौता देता है
बाढ़ - भूस्खलन के साथ
पहाड़ों के विनाश को । ~ प्रवेश ~


Friday, June 20, 2014

रचना - रच ना |

तू रच ना
रचेगा तो
ख़त्म हो जाएगी
मौलिकता |
फूटने दे
ज्वालामुखी की तरह,
पानी सा बह जाने दे ,
रचेगा तो
दुनिया फिर कहेगी
रचना - रच ना | ~ प्रवेश ~ 

Monday, June 2, 2014

चोटी का आम

अनाड़ी के पत्थर की पहुँच से दूर 
पेड़ की चोटी पर लगा आम 
जिस तक पहुँच नहीं सकती 
किसी तोते की चोंच भी ,
किसी दिन पके या न पके 
जब झड़ेगा तो 
कीड़े पड़ चुके होंगे ,
तब तक धन्य हो चुके होंगे 
नीचे लगे आम 
जिन्हें ग्वालों ने खाया 
तोते कुतर गए 
जो पहुँच में थे 
राह चलते बुजुर्गों की लाठी की । 
किसी के काम न आया तो 
अभिशाप सिद्ध होगा 
चोटी पर लगना । 
शीर्षस्थ भी हो तो भी 
सबकी पहुँच में रहो । ~ प्रवेश ~ 

Saturday, May 10, 2014

बुरा करके भला नहीं होता |

कुछ भी बेवजह नहीं होता ।
यूँ कोई बावला नहीं होता ॥

कीकर पर आम नही आते हैं ।
बुरा करके भला नहीं होता ॥

एक पहचान सच्चे यार की है ।
दोस्त कभी दोगला नहीं होता ॥

असर घर से मिली तालीम का है ।
हर कोई मनचला नहीं होता ॥

हारकर मायूस ना हो, हौंसला रख ।
बन्दा चाहे तो क्या नहीं होता ॥

सियासत अब तलक मेरी समझ से ।
यहाँ कोई सगा नहीं होता ॥ ~ प्रवेश ~ 

Thursday, May 1, 2014

गिरगिटी अंदाज़ देखना

या तो हाथ आएगी या कुर्सी छूट जाएगी ।
अब दिन - ब- दिन तुम गिरगिटी अंदाज़ देखना ॥  १

फ़ासला कुर्सी तलक घटने लगा है ।
जनाब का बदला हुआ मिज़ाज देखना ॥ २

चुनाव है इसलिए चूल्हे पर पतीली है ।
फिर गगनचुम्बी टमाटर और प्याज देखना ॥ ३

सड़क पर जो जोश में चिल्ला रही है ।
इसी भीड़ की दबी हुई आवाज़ देखना ॥ ४

इसी मौसम में जिन चूजों के पर निकलेंगे ।
पाँच साल में उन परिंदों की परवाज़ देखना॥ ५ 

सियासत में किसी से कुछ छिपा नहीं रहता ।
उफनते - दफ़नते नये राज़ देखना ॥  ६  ~ प्रवेश  ~ 
                        

Monday, April 21, 2014

वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक ।

वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक ।
पहुँच पाती है कहाँ कोई योजना मजबूर तक !!

आ गया है खेत तक खादी में लिपटा अजनबी ।
आज उसकी पहुँच जाने क्यों हुई मजदूर तक !!

आज उसको झोंपड़ों की याद फिर से आ गयी ।
आशियाँ जिसका है जन्नत , शाम - ए - मंजिल हूर तक ॥

चूसता है आम कहकर आदमी को ख़ास ही ।
हो गया है आम अब बदनाम से मशहूर तक ॥

कोई जलने के लिए , कोई जलाने के लिए ।
जल रहा है आदमी धूप  से तंदूर तक ॥  ~ प्रवेश ~ 

Friday, April 18, 2014

मुझमें तू अभी तक है

किताब में दफ़न गुलाब की खुशबू अभी तक है ।
अरसा बीत गया है, मुझमें तू अभी तक है ॥

खेत - खलिहान सब तो नीलाम हो गये ।
झूठी बची मगर आबरू अभी तक है ॥

खिड़की पे दम तोडती हैं ख्वाहिशें वस्ल की ।
तुझसे मिलने की आरजू अभी तक है ॥

ग़ज़ल में अपने जिक्र से हैरान ना होना ।
मेरी कलम में सियाही , रगों में लहू अभी तक है ॥
                                                               ~ प्रवेश ~

Friday, March 28, 2014

उल्लू बनो

हर पल तुम्हें बनाने की
कोशिश रहती है उनकी
कभी गधा - कभी उल्लू ,
तुम बनते हो पहला 
लदते जाते हो 
चूं - चपड़ नहीं करते 
काटना भी नहीं सीखा 
ना दुलत्ती ही मारते हो 
और वो बनाते रहते हैं। 

कभी दूसरा नहीं बने
बनते तो जान जाते 
कैसे किया जाता है  
रातों में शिकार 
कैसे बिना आवाज किये 
सुनसान में 
लगायी जाती है गश्त 
कैसे डराया जाता है 
बड़ी - बड़ी आँखें दिखाकर
कैसे पंजे में दबाकर
नोंचा जाता है बेबस को।

एक बार उल्लू बनो
फिर गधे नहीं बनोगे
पर याद रखना
फिर उल्लू मत बनाना
औरों को - गधा भी नहीं।
                         ~ प्रवेश ~ 


कवि नहीं मरते


एक कवि को सरेराह
तीन नकाबपोशों ने पकड़ा
कसकर जकड़ा
खूब घसीटा
बेदर्दी से पीटा
एक कोठरी में खींचा
जोर से भींचा
अँधेरा था घुप्प
सुनसान - चुप।

मिलकर साथ
बाँध दिए हाथ
घुटने मोड़कर
एड़ी कूल्हों से जोड़कर
नीचे बिठाया
खूब धमकाया।

एक ने मुँह खोला
अकड़कर बोला
क्यों इतना तना तू ?
किस मिट्टी का बना तू ?
क्या खाता है ?
शब्दजाल कहाँ से लाता है ?
कुछ भी लिख
चुनाव पर  मत लिख
घोषणाओं पर मत लिख
अधर में लटकी
योजनाओं पर मत लिख।
घपलों को भी छोड़
घोटालों पर मत लिख
सफेदी के अंदर के
कालों पर मत लिख।
ये प्यार है
समझाइश है
ये मत समझ कि
जोर आजमाइश है।
तू काबिल है
समझदार है
हमारी पार्टी की ओर से
टिकट का हक़दार है।

कवि चुप रहा।

दो थप्पड़ रसीद कर
बालों को खींचकर
बैठ गया पहला
अब बोला अगला।

तू कवि-हृदय है
सहृदय है
मैंने पढ़ा है तुझे
प्रकृति पर तू
बहुत खूब लिखता है
पर्वत से गिरता झरना
तेरी कविता में
साक्षात् दिखता है।
तू नदी पर लिख
पहाड़ों पर लिख
घाम पर लिख
जाड़ों पर लिख
फूलों पर लिख
पत्तों पर लिख
डाली से लटके
छत्तों पर लिख।
आध्यात्म से जुड़
भौतिक को त्याग
मत लिख चल - अचल
संपत्ति का भाग
मेरे धनार्जन के
तरीके पर मत लिख
मेरे कारोबारी
सलीके पर मत लिख
मुझ पर मत लिख
मेरे बन्दों पर मत लिख
मेरे दान पर लिख
गोरखधंधों पर मत लिख।
ये ले खाली चेक
अपनी कीमत भर दे
अपनी कलम से
मुझे मुक्त कर दे।

कवि चुप रहा
अगला ऐंठ  गया
दो थप्पड़ जड़कर
वो भी बैठ गया।

आयी तीसरे की बारी
घूसखोर अधिकारी
ने घटना को तोला
और दोनों से बोला
साहब
शायद आप नहीं जानते
लातों के भूत
बातों से नहीं मानते।
सिगरेट जलाओ
इसकी उँगलियों को दाग दो
पैरों से बाँधकर
उल्टा पंखे से टाँग दो।
शायद हमारी
समस्या को जान जाये
इतना करने से
शायद मान जाये।
दूसरा बोला
इसकी उँगलियों को काट दो
गली के आवारा
कुत्तों में बाँट दो।
बोला पहला
कुछ तो करना पड़ेगा
मेरे हिसाब से
इसे मरना पड़ेगा।

जोर- जबर्दस्ती कर
उसके सीने पर चोट किया
दो ने हाथ-पाँव पकड़े
एक ने गला घोंट दिया।
पहले ने कहा जो भी हो
लिखता कमाल था
मुझे तो बस अपनी
खिलाफत का मलाल था।
आओ अब इसका
दिमाग छानते हैं
इसकी कविताओं का
राज जानते हैं।
छैनी लगायी
मारा हथौड़ा
ढक्कन सा खोल दिया
सर को फोड़ा।

तीन जंतु
देखने लगे तंतु
कोशिकाओं का जाल
हुआ कमाल
हाथ लगी गुद्दी
छानने लगे बुद्धि।

मिले कुछ चित्र
चौंके तीनों मित्र
भूखे - नंगे बच्चे
मकान कच्चे
घास की झोंपड़ी
बारिश में रो पड़ी
गली बदबूदार
सड़क बीमार।

शिक्षित लाचार
बेरोजगार
नौकरी  का इश्तहार
आवेदकों की कतार
सरकारी दफ्तर
घूसखोर अफसर
बेबस गरीबी
अफसर  के करीबी।

कुछ चित्र सुहाने
नदी के मुहाने
रेत के टीले
बंजारों के कबीले
हरी - हरी घास
नीला आकाश
लहलहाता धान
मेहनतकश किसान।

उषा का उन्मेष
घर लौटता राकेश
पत्तों पर ओस
पंछियों का जोश
अँगड़ाते लोग
जोगियों का जोग
पानी की पीड़
नलके पर भीड़
ठनकते घड़े
खनकती चूड़ियाँ
औरतों के झगड़े
रोज के रगड़े।

अब तक की एल्बम
निकली बेदम
नो इंटरेस्ट
टाइम वेस्ट
मजा नहीं आया
एक भी चित्र न भाया।
पहले ने कुरेदा
भीड़ को देखा
पंगा हो रहा था
दंगा हो रहा था
देखता रहा एकटक
विचारा अचानक
मैं यहाँ जाऊँगा
वोट बनाऊँगा
जाति के नाम पर
धर्म के नाम पर
भेड़ चाल जनता को
टोपी पहनाऊँगा।

अगले चित्र में बस्ती
जमीन बड़ी सस्ती
दूसरे को भा गयी
ख़ुशी की झलक
उसके चेहरे पर आ गयी
तीसरे को कहा
ये जगह दिला
अजी महज कहने से
महफ़िल नहीं सजती
ये तो आप भी जानते हैं
कि एक हाथ से
कभी ताली नहीं बजती
निकलवाओ आदेश
हमें दो थमा
कुछ हमारे खाते में भी
कर दो जमा
आदेश इनका
तरकीब हमारी
कौड़ियों के भाव
ये जमीन तुम्हारी।

और भी थे चित्र
थक चुके मित्र
इसको गाड़ दो
क्रियाकर्म कर चलें
शाम होने को है
चलो घर चलें।
गड्ढा खोदकर
कवि को दफ़न करते हैं
नादान - कमअक्ल
जानते नहीं
इंसान मर जाता है
कवि नहीं मरते हैं।
~ प्रवेश ~ 

Thursday, February 13, 2014

यूँ ही किसी के सितारे बुलंद नहीं होते ||

विचारों में जिनके कभी अंतर्द्वंद नहीं होते |
मेहनती की उन्नति के दरवाजे बंद नहीं होते |
सफलता बेताबी से कदम चूमती है उनके ,
यूँ ही किसी के सितारे बुलंद नहीं होते || ~ प्रवेश ~

Wednesday, January 22, 2014

आओ , हम बन जाएँ |

आप, आप ना रहें 

मैं , मैं ना रहूँ 

आप मुझमें शामिल होवें तो 

मैं आपमें शामिल हो जाऊँ ,

आओ , हम बन जाएँ |  प्रवेश