मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, December 31, 2013

मेरी माँ पढ़ लेती है मुझे

तुमने बाँचा है मुझे
मुझसे अलग होने पर ,
कभी मुझे 
मुझमें ही नहीं पढ़ पाये हो ,
तुमने इंतजार किया है 
मेरे छपने का
लिखे जाने का ,
पढ़े - लिखे हो 
लिखा पढ़ सकते हो 
वो भी उसी भाषा में 
जो तुमने पढ़ी है
पढ़ने के लिये |
मेरी माँ पढ़ लेती है मुझे
टेलीफोन पर ही ,
मेरा मौन भी
सही - सही उच्चरित कर लेती है ,
साक्षरों में शामिल नहीं है फिर भी,
लिखा जो नहीं पढ़ पाती | ~ प्रवेश ~

Friday, December 27, 2013

अरी ओ धूप !

अरी ओ धूप !
इतनी कड़ाके की ठंड से 
तुझमें अकड़  क्यों नहीं आती  ?
तू सीधी ही पड़ रही है  
आज भी जेठ की तरह |
थोड़ा बांकपन ला 
थोड़ी सी टेढ़ी हो जा 
और मुड़कर पहुँच जा 
मेरे द़फ्तर के खोमचे में |
मैं इतना ताम - झाम लेकर 
बाहर नहीं बैठ सकता |  ~प्रवेश ~

Wednesday, December 11, 2013

रेलगाड़ी का जनरल डिब्बा (भाग - 1 )

पूरी तरह विरामावस्था में
नहीं आयी है रेल
और शुरू हो गयी है
चढ़ने वालों की रेलमपेल |

जल्दी में नहीं हैं
उतरने वाले,
उन्हें खयाल है अपने पैरों का
प्रेम है अपने दाँतों से
चढ़ने वाले जोश में हैं
बेखबर हैं इन सब बातों से |

रुक गयी है रेल
रुक गया है जनरल कोच
इस कोच के दरवाजे पर
बड़ी अजीब है सोच |

चढ़ने - उतरने वालों का
हो गया है सामना
अन्दर जाकर सीट मिले
चढ़ने वालों की कामना |

भाई मेरे ! जब अन्दर वाली
भीड़ बाहर आ जायेगी
पाँव रखने लायक जगह तो
ख़ुद - ब - ख़ुद हो जायेगी |
                                         ~ प्रवेश ~