मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, August 31, 2013

और भी कई काम हैं मुझे

ऑफिस जाना
काम करना
घर लौटना
बाजार जाना
राशन लाना
सब्जी लाना
फिर घर जाकर
पानी भरना
दूध लाना
खाना बनाना
किताबें भी पढता हूँ मैं
खाना खाना
और सो जाना
दुनियाभर के और भी
कई काम हैं मुझे
तुझे याद करने के सिवाय ,
इसलिये
अब तुझे
भूलना ही छोड़ दिया ।
                     " प्रवेश "

Saturday, August 24, 2013

बेशक रहो शालीन, पर हुंकार भी रखो ।
लबों पर हँसी , कमर में कटार भी रखो ॥

इंसान हो तो प्यार से पुचकारना भला ।
हैवान हो तो जेहन में दुत्कार भी रखो ॥

बनना - सँवरना , रूप पर इतराना कब तलक ।
कोमलता रखो पर चेहरा रौबदार भी रखो ॥

अंजाम जो भी हो, अस्मत से बड़ा नहीं ।
अब तो लड़ाई आर की या पार की रखो ॥ ~ प्रवेश ~




Friday, August 16, 2013

भीमिया की लुगाई

आजाद है भीमिया की लुगाई
उसे आजादी है
अपने घर में खुलकर हँसने की
अपना मुखड़ा दिखाने की
घुटनों तक घूंघट नहीं करना उसे |

उसे आजादी है
भीमिया को गलत बात पर टोकने की
नसीहत देने की
अपनी राय रखने की,
वो बस भीमिया की लुगाई नहीं
खुद का अस्तित्व रखने वाली
एक औरत भी है |

उसे आजादी है
रास्ता पूछने वाले को रास्ता बताने की
चाहे वो मर्द हो या औरत
उस पर बंदिश नहीं है
अजनबी से बात करने की |

वो खुश है अपनी आजादी से
उसे फख्र है
भीमिया की लुगाई होने पर,
मजदूर है भीमिया
और अनपढ़ भी || " प्रवेश "

Monday, August 12, 2013

क्यों इस तरह से बवाल कीजिये

क्यों इस तरह से बवाल कीजिये 
अब खुद ही अपनी कोई ढाल कीजिये ।

बेटे तो  तुम्हारे पालने तक ही थे 
अम्मा ! अब खुद अपनी देखभाल कीजिये । 

आता नहीं अगर कोई जवाब उधर से 
तो फिर क्यों सवाल पे सवाल कीजिये !

इससे पहले कि जंग खा जाये
तलवार का सही इस्तेमाल कीजिये । 

हौंसला न कीजिये जवानी की तरह 
तनिक उमर का भी तो खयाल कीजिये । 
                                             " प्रवेश " 

भारी होती हैं बेटियाँ

बहुत भारी होती हैं बेटियाँ
बेटा गोद में होता है
कभी कंधे पर भी
सिर पर भी चढ़ जाता है
और बेटी को --
अगर नसीबों वाली है तो,
चलना होता है
उँगली पकड़कर,
गोद में नहीं उठाना है उसे
क्योंकि भारी होती हैं बेटियाँ ।

नौकरी ढूँढ रहा है बेटा
कोशिश तो कर ही रहा है
और कोशिशों में बिता चुका है
पैंतीस बसंत,
फिर भी बोझ नहीं है बेटा ,
बीस की हो गयी है बेटी
उसकी उम्र में
माँ बन गयी थी माँ -- दो बच्चों की,
कोई रिश्ता नहीं आया अब तक
और गली में उसकी उम्र की
कोई है भी तो नहीं,
बोझ बन गयी है बेटी ।

बहुत भारी होती हैं बेटियाँ !! " प्रवेश "
                           

कोशिशें

कोशिशें
अक्सर कामयाब हो जाती होंगी ,
लेकिन कोशिश करने वाले
कामयाब हो ही जाने की
कोशिश नहीं करते ।

कहीं ना कहीं
नाकामयाबी  के लिये
जगह छोड़ देते हैं
कोशिश करने वाले
और सफाई देने के लिये
गुंजाइश भी,
"कोशिश तो की थी "।

जो कामयाबी को निशाना बनाते हैं
उन्हें पक्षी , पेड़, पत्ते, सहचर
और आसमान नहीं दिखाई देता,
उन्हें दिखाई देती है
तो केवल पक्षी की आँख ।

साधक द्वारा
साधन से
साध्य की प्राप्ति ।  ~  प्रवेश ~