मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, July 23, 2013

आज नहीं घर में दाना

सुन रे पंछी - तू कल आना
आज नहीं घर में दाना ।

खाली चावल की थाली है
गेहूँ का पीपा खाली है ।
मैंने भी नहीं खाया खाना
आज नहीं घर में दाना ।

हाँ , मैं ही अन्न उगाता हूँ
दुनिया को खिलाता हूँ ।
मैं भूमिपुत्र, सबने माना
पर आज नहीं घर में दाना ।

मैं हूँ किसान, मेरे खेत नहीं
मिट्टी भी नहीं और रेत नहीं ।
मैं बिना हृदय का दीवाना
आज नहीं घर में दाना ।

हाथ नहीं फैलाता हूँ
भीख माँग नहीं खाता हूँ ।
मुझे आत्महन्ता ही कहलाना
आज नहीं घर में दाना ।
                       " प्रवेश "

Monday, July 8, 2013

मोक्ष नहीं है कुर्सी

भूल कर रहे हो
कुर्सी को मोक्ष समझ रहे हो ।

मोक्ष नहीं है कुर्सी ,
एक दोराहा है ।

एक रास्ता स्वर्ग को
और दूसरा नरक को जाता है ।
एक पुण्य की ओर
और दूसरा पाप की ओर  ले जाता है ।

तुम कुर्सी पर विराजमान हो ,
फैसला तुम्हारा ,
नरक को प्रस्थान या स्वर्ग को ?

कुर्सी ने तुम्हें जो शक्ति दी है
उससे तुम चाहो तो
आशीर्वाद और दुआएँ अर्जित कर लो
और चाहो तो श्राप और पाप ।

(सुना है कि कर्मों का फल
इसी जन्म में भुगतना होता है ,
 फिर भी - कल किसने देखा !!)
                                                " प्रवेश "



Tuesday, July 2, 2013

दिल में कुछ अरमान बचाकर रख लो ।

दिल में कुछ अरमान बचाकर रख लो ।
मुट्ठी में तूफ़ान बचाकर रख लो ॥

भूख कहीं सब चावल- चावल ना कर दे ।
दो - एक मुट्ठी धान बचाकर रख लो ॥

माना कि आसानी से बिक जाता है ।
थोड़ा सा ईमान बचाकर रख लो ॥

मुझसे मत पूछो महफूज कहाँ होगी ।
रख पाओ तो जान बचाकर रख लो ॥

दर्द दूसरे  का भी तो महसूस करो ।
पुतले में इंसान बचाकर रख लो ॥

छोड़ो दकियानूस दलीलें मजहब की ।
प्यारे ! हिन्दुस्तान बचाकर रख लो ॥
                                     " प्रवेश "