मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, June 19, 2013

मेघा रे ! तुम क्यों बरसे ?

मेघा रे ! तुम क्यों बरसे ?
मंदिर - मस्जिद कुछ न छोड़ा
सब बहा ले गये शहर से ।

क्या बड़ी - क्या छोटी
तोड़ डाली पर्वत की चोटी
भारी - भरकम पेड़ न छोड़े
कोई बचा न तुम्हारे कहर से ।

बह गये युवा - बूढ़े और बच्चे
तूने ना देखे झूठे - सच्चे
जो रह गये वो थर्र थर्र काँपे
तेरे प्रकोप के डर से ।

गलियाँ बह गयी, गाँव बह गये
उखड़ गये जब पाँव , बह गये
कोशिश का मौका भी न दिया
निकल भी न पाये घर से ।

मवेशी क्या इन्सान न छोड़े
तूने तो भगवान न छोड़े
छोड़े तो शमशान ही छोड़े
सब ख़त्म कर दिया जहर से ।

भवन ढहे ज्यों ताश के पत्ते
कुछ भी नहीं बचा अलबत्ते
तुम  से तो सारे ही हारे
ताज उठा ले गये सर से ।

जिम्मेदार नहीं हो तुम ही
गुनहगार बराबर हम भी
हरे - भरे जंगल उजाड़कर
पहाड़ बना दिये जर्जर से ।

बहती ना तो और क्या करती
चिरी - फाड़ी नंगी धरती
तुम्हें कोसना मज़बूरी है
आफत आई अम्बर से ।
                            " प्रवेश "