मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, May 3, 2013

कोयल अब इस उजाड़ में बोलती नहीं ।

कोयल अब इस उजाड़ में बोलती नहीं ।
मिसरी सी बोली कानों में घोलती नहीं ।।

नदी के बीच में पत्थर प्यासे पड़े हैं ।
पानी नहीं तो कश्ती कोई डोलती नहीं ।।

उसको कहा तू लड़की है , छोड़ बचपना ।
घर पहुँचने पर मुन्नी जेबें टटोलती नहीं ।।

सड़क पर देखा था कत्लेआम सभी ने ।
ये भीड़ निरी गूँगी है , जुबाँ खोलती नहीं ।।

हमदर्द नहीं है , सरकार बनी बैठी है ।
गरीब को इंसान  सा तोलती नहीं ।।
                                          " प्रवेश "

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