मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, May 13, 2013

खाकी से डर लगता है

नदी किनारे घर है
पर तैराकी से  डर लगता है । 

मैखानों का शौक भी है 
और साकी से डर लगता है । 

सिर्फ तुम्ही पर ऐतबार है 
बाकी से डर लगता है । 

शौक नहीं  परदे का 
तांका - झाँकी से डर लगता है । 

जाने दुनिया क्या सोचे !
बेबाकी से डर लगता है । 

दोस्त बताती है खुद को 
पर खाकी से डर लगता है । 
                                  " प्रवेश " 


Friday, May 3, 2013

कोयल अब इस उजाड़ में बोलती नहीं ।

कोयल अब इस उजाड़ में बोलती नहीं ।
मिसरी सी बोली कानों में घोलती नहीं ।।

नदी के बीच में पत्थर प्यासे पड़े हैं ।
पानी नहीं तो कश्ती कोई डोलती नहीं ।।

उसको कहा तू लड़की है , छोड़ बचपना ।
घर पहुँचने पर मुन्नी जेबें टटोलती नहीं ।।

सड़क पर देखा था कत्लेआम सभी ने ।
ये भीड़ निरी गूँगी है , जुबाँ खोलती नहीं ।।

हमदर्द नहीं है , सरकार बनी बैठी है ।
गरीब को इंसान  सा तोलती नहीं ।।
                                          " प्रवेश "

शायद ! कविता तैंयार है ।

एक कड़ाही  है , एक थाली है ।
रसोई अभी संभाली है ।
जुगाड़ भी है आँच का ।
मौका है कुछ जाँच का ।

कुछ शब्द रखे हैं छाँटकर ।
स्वादानुसार बाँटकर ।
अलग - अलग मसाले हैं ।
सबके स्वाद निराले हैं ।

कोई तेज है , कोई फीका है ।
अपना - अपना तरीका है ।
ये सच है , थोड़ा तीखा है ।
मीठा बनना नहीं सीखा है ।

तैंयार सामग्री सारी  है ।
कविता बनने की तैंयारी है ।
ट्रेनिंग अभी अधूरी है ।
सावधानी जरूरी है ।

प्यार की दे दी आँच नरम ।
तेल लक्ष्य का हुआ गरम ।
अब तड़का भावों का डाला ।
फिर मिला दिया है  मसाला ।

शुरू हुई नयी पारी ।
डाले शब्द बारी - बारी ।
अब पानी डाला नापकर ।
पकने को छोड़ा ढाँपकर । (ढाँपकर = ढककर )

धीमी आँच पर पकाई ।
चम्मच से थोड़ी हिलाई ।
एक खुशबू आर - पार है ।
शायद ! कविता तैंयार है ।
                          " प्रवेश "









Thursday, May 2, 2013

तुमसे यारी हुई

तुमसे यारी हुई
बहुत उधारी हुई ।

जाने कितनों से पंगा लिया
कितनों से मारामारी हुई ।

बहुतों को सीने में दर्द हुआ
बहुतों को दिल की बीमारी हुई ।

गली - गली लेनदार हो गये
पहले न इतनी देनदारी हुई ।

आसमां पर तुम्हारे नखरे गये
जमीं पर मेरी जमींदारी हुई ।
                                   " प्रवेश "