मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, March 22, 2013

बदजबान

एक काले धागे में 
पिरोये हुये 
चंद छोटे काले दानों 
और बालों को पाटती हुई 
लकीर में काढी गयी 
एक रंग की रंगोली के बदले, 
चुपचाप और स्तब्ध 
सारी जिंदगी 
मेहनत -  मजदूरी करके ,
अपना पेट काटकर ,
पेट भरती रही 
उसकी अय्याशियों का ।
आज मुँह खोला 
और जमाने ने उसको 
बदजबान कह दिया ।
                        " प्रवेश "




No comments:

Post a Comment