मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, March 6, 2013

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !

ह्रदय में कुछ भूसे सा जल रहा है ,
कोई फूल को पैरों तले कुचल रहा है ,
कोई तटस्थ हो देख रहा है शालीन होकर ,
कोई भींचकर मुट्ठी खुशियाँ मसल रहा है ।
कोई आँसुओं से तन -मन भिगोकर 
मौन है , स्तम्भित खड़ा सब सह रहा है ।

किसी को दल की, किसी को पद की चिंता,
राष्ट्र दूजा , सबसे पहले कद की चिंता ,
जात ऊपर , इंसानियत औंधे पड़ी है ,
किसी को मंदिर और मस्जिद की चिंता ।
प्रेम का जो घर बना था नदी तीरे 
द्वेष की प्रचंड बाढ़ से ढह रहा है ।

बदहाल है भूपुत्र , बेबस तप रहा है ,
धूप - बारिश - लू के थपेड़े खप रहा है ,
आस से नजरें गड़ाये है वो जिस पर 
वो तो बस वादों की माला जप रहा है ।
धूप में निकला नहीं, क्या खबर उसको 
कैसे स्वेद से मिलकर लहू भी बह रहा है ।

कौन - कब - कहाँ - कुछ कह रहा है !
                                                    " प्रवेश "

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