मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Wednesday, February 20, 2013

कृतघ्न परजीवी

कब तक चिपके रहोगे
भैंस की पीठ पर
जूँ की तरह !
तुम्हारा अस्तित्व है
इस चौपायी सीट पर
धूँ की तरह ।
तुम यहीं उपजते हो
भैंस की पीठ पर ,
यहीं मरते हो
यहीं जीते हो ।
फिर भी ग़जब करते हो
जिसने आसरा दिया
उसी का लहू पीते हो ।
एक भ्रम में हो तुम
कि लहू पीकर यशस्वी हो ,
चिरंजीवी हो ।
अगर सुन सको तो सुनो
तुम दुनिया की नजरों में
महज एक कृतघ्न
परजीवी हो ।
                          " प्रवेश "

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