मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, February 2, 2013

अफ़सोस ..तुम्हें दिल से हराना नहीं आता

सोचा तुमसे सीखेंगे दिल जीतने का हुनर ।
अफ़सोस ..तुम्हें दिल से हराना नहीं आता ।।

अरे .... तुम खुद को शहंशाह समझते हो ।
सितम ढाना नहीं आता , रहम खाना नहीं आता !!

अपाहिज हो मरेगा शागिर्द तुम्हारा ।
तुम्हें उँगली पकड़कर चलाना नहीं आता ।।

जंगल से आयी है , बेहया है हवा ।
इसे सलीके से पर्दा उठाना नहीं आता ।।
                                         " प्रवेश "

No comments:

Post a Comment