मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, December 1, 2012

पहाड़ है गीं खरण पट्ट


पहाड़ है गीं खरण पट्ट
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पहाड़ है गीं
खरण पट्ट ,
नौजवान है गीं
अरण पट्ट ।

कोई बार पढि बेर
कोई अनपढ़ हबेर ,
सब भाज मीं शहर होणि
आँख बुजि बेर ।

पहाड़ में कैक मन
लागण नि रौय ,
सबुकैं शहरौक
चाव चढि गोय ।

कोई पलटि बे नि देखुन
पहाडक उजियाणी,
लागि गे सबुकैं
शहरैकि खाणी  ।

ठण्डी हवा , ठण्डो पणिक
भुलि गयीं मोल ,
बुलान लै नि छीं अब ऊं
पहाड़ी बोल ।

भौत आस लगे  रै
बड़े धीरज धरि रौछ
पहाडुल आज लै
उनौर बाटो तकि रौछ ।
     
                     " प्रवेश "

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