मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, December 31, 2012

मारिये शैतान को मन के ही कारागार में

न दिखइये न छापिये
बस खबर ही अख़बार में ।
कबहूँ तो भीतर झाँकिये
ह्रदय के संसार में ।।

झकझोरिये - धिक्कारिये
दुत्कारिये दुष्कर्म को ।
बोइये इंसानियत
बंजर पड़े व्यवहार में ।।

कुंद मन की भावना को
धार लगवा लीजिये ।
या धार लगवा लीजिये
जंग लगी तलवार में ।।

फिर कभी बनने न पाये
कोई बेटी दामिनी ।
भरिये संवेदनाएँ भी 
बेटों के संस्कार में ।।

विधि के रोके क्या रुकेंगे
हृदयविदारक हादसे !
मारिये शैतान को
मन के ही कारागार में ।।
                                " प्रवेश "



Saturday, December 29, 2012

आज गम है कि कोई गम नहीं

कल गम था कि गम कम नहीं ।
आज गम है कि कोई गम नहीं ।।

सुधर गया वो सितमगर कैसे !
या ढाने लायक कोई सितम नहीं ।।

दिल वीरां है , हँसी लब पे है ।
ये और बात है  आँख नम नहीं ।।

मुझे यकीं है वो आसान मौत बख्शेगा ।
मेरा महबूब इतना भी बेरहम नहीं ।।

लगता है ज़मीर मर गया शायद ।
ये कैसा खून है , जो खौलकर गरम नहीं ।।

                                          " प्रवेश "

Friday, December 21, 2012

अलग - थलग

आकर मेरे पास वो , करने लागी बात ।
नैन गड़ाये नैनों में , हाथों में ले हाथ ।।
हाथों में ले हाथ, चिकनी चुपड़ी लगाई ।
चालबाजी उसकी मुझे, जरा समझ न  आई ।।
कहे 'प्रवेश' देखा नहीं , ऐसा कभी फरेब ।
नैन गड़ाये नैनों में , काट गयी वो जेब ।।   1 ।।

बीवी मइके भाग चली , आकर मियाँ  से तंग ।
कह गयी अब न रह सकूं , कभी तुम्हारे संग ।।
कभी तुम्हारे संग , लौटकर ना आऊँगी ।
इससे अच्छा किसी कुएँ में, डूब के मर जाऊँगी ।।
कहे ' प्रवेश ' एक शर्त है , जो  पाना चाहो बीवी ।
जल्दी से केबल लगवा लो , ले आओ एक टीवी ।।   2 ।।

जुर्म हुआ संगीन और धरे आरोपी पाँच ।
किसकी कितनी भागीदारी , पुलिस कर रही जाँच ।।
पुलिस कर रही जाँच , किसने लूटी अस्मत ।
किसने हाथापाई की , किसकी फूटी किस्मत ।।
कहे ' प्रवेश ' जनता करे , फाँसी की फरियाद ।
जिसकी जुर्म की सोच हो , करे ये सजा याद ।।   3 ।।

पुलिस कर रही शक्ति का , अनुचित इस्तेमाल |
जिसने भी आवाज की , उसकी खींची खाल ||
उसकी खींची खाल , जो हक की बात करे |
न्याय की माँग करे , उन पर आघात करे ||
कहे प्रवेश पुलिस की , जनता से क्या रंजिश |
फर्ज निभाये फर्ज से , साथी बने पुलिस || 4 ||

जनता चिंता कर रही , अरु चिंतन सरकार |
पाँच साल फिर से कैसे , होगा भ्रष्टाचार ??
होगा भ्रष्टाचार , ये बात तो तय है |
लेकिन कौन करेगा , अभी थोड़ा संशय है ||
कहे प्रवेश समेट लो , जिसका जितना बनता |
इतना चिंतन ना करो , कहीं जाग न जाये जनता || 5 ||

दिल्ली पहुँचे जीतकर , ले वादों का बोझ ।
बोझा कैसे कम करें , शुरू हो गयी खोज ।।
शुरू हो गयी खोज , कैसे वादा निभायें ।
वादा गर निभायें , तो खुद कैसे कमायें ।।
कहे प्रवेश दही की , रखवाली करे बिल्ली ।
वादे सब फुर्र हो गये , जबसे पहुँचे दिल्ली ।। 6 ||


ठाठ उन्हीं के हो रहे , रहे जो तलवे चाट |
बाकी जनता कष्ट में , रही है जीवन काट ||
रही है जीवन काट , गम की बदली हट जाये |
आस लगाये बैठी है , बाकी अच्छी कट जाये ||
कहे ' प्रवेश ' योजनाओं की , चमचों में बंदरबाँट |
दुखियारों के दुख बढ़े , ठाठ वालों के ठाठ || 7 ||

पुलिस लाग री हाथ धोकर , सटोरियों कै गेल |
होण लाग रिया खेल में,  खेल कै भीतर खेल |
खेल कै भीतर खेल , जाणे सै कितनी मछली |
इब निकलेगी सूद समेत , सगड़ी आगली पिछली |
कहे प्रवेश हो रिया हैं , चालिस में घपचालिस |
देखण आली बात है , कठे पहुँचेगी पुलिस || 8 ||

मौज उड़ायें नेता जी, जनता झेले त्रास । 
लग जायेगी बद्दुआ , हो जायेगा नाश ॥ 
हो जायेगा नाश, कुछ भी नहीं बचेगा । 
फिर कोई खादीधारी, षड़यंत्र नहीं रचेगा ॥ 
कहे 'प्रवेश' जनता की, सेवा में लगी है फ़ौज । 
जब तक चोट नहीं लगे, करने दो इन्हें मौज ॥ 9 ॥ 

कविता से घर ना चले, करो गौर कविराज । 
कलम किनारे छोड़ के, सीखो घर के काज ॥ 
सीखो घर के काज, धन का अर्जन सीखो । 
बेमतलब की बातों का, जरा विसर्जन सीखो ॥ 
कहे 'प्रवेश' किस काम की, झूठी ज्ञान की सरिता!
बच्चे भूखे मर रहे, अब तो छोडो कविता ॥ 10 ॥ 

खाया बड़े ही चाव से, बिन पूछे ही भाव |
देख के पर्चा खर्चे का, हो गया दिल में घाव ||
हो गया दिल में घाव, कौन भरे ये खर्चा |
महँगा खाना खा गये, हुई ज़ोर की चर्चा ||
पूछत है प्रवेश, किस विधि से पकाया ?
इतने का खाना पहले, एक माह में खाया ||  11 ||

राम को पीछॆ जोड़कर, बड़ा बनाया नाम |
बड़े नाम की आड़ में, करे घिनौने काम ||
करे घिनौने काम, फिर भी सीना ताने |
विधि को भी ललकार दे, जाने किस बहाने !!
कहे प्रवेश सब सिद्ध है, पास अगर हो दाम |
बाकी ख़ुद ही झेलेगा, नाम के पीछॆ राम || 12 ||

लोक लुभावन वादों से जीत गये चुनाव |
वादे पूरे करने हैं तो खाने लगे हैं भाव ||
खाने लगे हैं भाव , करते पत्राचार |
पहले आप - पहले आप , नहीं बनी सरकार ||
ठगी - ठगी सी जनता को फिर रहे चुनाव में झोंक |
एक चुनाव से समझ रहे , जीत गये तिहुं लोक || 13 ||

वोट डालने जो गया , है वो जिम्मेदार |
जो घर से निकले नहीं, उनको लख धिक्कार ||
उनको लख धिक्कार, मानते वोट मजबूरी |
नहीं जानते लोकतंत्र में, है मतदान जरूरी ||
कहे प्रवेश जाकर हक से, करो वोट की चोट |
अंत समय तक भी अपना, देकर आओ वोट || 14||

                                               
   " प्रवेश "


Saturday, December 15, 2012

हालत बड़े बुरि छौ

हालत बड़े बुरि छौ 

खेति - पाति बुसी गे
सिसौंण छौ और कुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

कुण बाड़ खन्यार छीं
बीचम बे टुटी धुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

हाथम बोतल छौ  सबुकि
कमर हौन खुकुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

क्वे नि छौ गौं पन
मलिबाखई पनी का , तलिबाखई भुरि  छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

ब्याव लूणम रौट खानी
दादागिरी पुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।
                           " प्रवेश "
       

Friday, December 14, 2012

न दारू न हकीमों की दवा काम आयेगी

न दारू न हकीमों की दवा काम आयेगी

न दारू न हकीमों की दवा काम आयेगी ।
जब भी आयेगी , माँ की दुआ काम आयेगी ।।

अब दिल को शहर की आबोहवा नहीं भाती ।
अब गाँव की ठण्डी हवा काम आयेगी ।।

तेरी बेवफाई का रंज नहीं मुझको ।
जो मैंने की है वो वफ़ा काम आयेगी ।।

भलाई जो भी करी , बेकार नहीं जायेगी ।
अभी ना तो, अगली दफा काम आयेगी  ।।

                                                     " प्रवेश "

Wednesday, December 12, 2012

क्रिकेट का मैदान है ये दुनिया

क्रिकेट का मैदान है ये दुनिया
www.praveshbisht.blogspot.com 

क्रिकेट का मैदान है ये दुनिया |
जिंदगी की पिच पर
मैच है तो पाँच दिन का
लेकिन नतीजा निकल आता है
चौथे ही दिन ।

संयम के साथ हर दिन
बहुत संभलकर खेलना होता है ।
अगर जीतना है शान से
तो शानदार प्रदर्शन जरूरी है
हर क्षेत्र में ।

बल्लेबाजी की कमजोरी
छिपाई जा सकती है
अच्छी गेंदबाजी से ,
और अच्छी बल्लेबाजी से
गेंदबाजी को बल मिलता है ।

जी जान लगा देनी होती है
क्षेत्ररक्षण में ,
और साथ ही जरूरी है
एक कुशल पथ - प्रदर्शक ।

भगवान साथ होने से ही
जीत हासिल नहीं होती,
मेहनती का साथ ही
जीत को पसंद है ।

जिंदगी जीना
कोई बच्चों का खेल नहीं ।
                                         " प्रवेश "

Saturday, December 1, 2012

पहाड़ है गीं खरण पट्ट


पहाड़ है गीं खरण पट्ट
www.praveshbisht.blogspot.com 

पहाड़ है गीं
खरण पट्ट ,
नौजवान है गीं
अरण पट्ट ।

कोई बार पढि बेर
कोई अनपढ़ हबेर ,
सब भाज मीं शहर होणि
आँख बुजि बेर ।

पहाड़ में कैक मन
लागण नि रौय ,
सबुकैं शहरौक
चाव चढि गोय ।

कोई पलटि बे नि देखुन
पहाडक उजियाणी,
लागि गे सबुकैं
शहरैकि खाणी  ।

ठण्डी हवा , ठण्डो पणिक
भुलि गयीं मोल ,
बुलान लै नि छीं अब ऊं
पहाड़ी बोल ।

भौत आस लगे  रै
बड़े धीरज धरि रौछ
पहाडुल आज लै
उनौर बाटो तकि रौछ ।
     
                     " प्रवेश "