मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, November 20, 2012

पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?

पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?
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ये शहर इतना दंगाई क्यों है ?
यहाँ भाई का दुश्मन भाई क्यों है ?

हर कोई नफरत की मशाल लिये खड़ा है ।
मोहब्बत की लौ बुझाई क्यों है ?

बहू तो बेटी जैसी नहीं है यहाँ ।
बेटे सा मगर जमाई क्यों है ?

कोई किसी की सुनता ही नहीं ।
तो बेवजह मुँहबजाई क्यों है ?

सुकून दिली तमन्ना है अगर ।
कायदों में इतनी ढिलाई क्यों है ?

आधे बदन उघाड़े फिरते हैं ।
कपड़े से महँगी सिलाई क्यों है ?

देखिये तो सही लड़खड़ाते कदम ।
जब पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?

                                            " प्रवेश "

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