मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, November 15, 2012

बरबादी से सीखा

बरबादी से सीखा
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गुलिस्तां ने सँवरना, बरबादी से सीखा ।
झगड़े से निकलना , फसादी से सीखा ।।

ताउम्र जो क़ैद को मुकद्दर समझता रहा ।
गुलामी का दर्द क्या है, आजादी से सीखा ।।

शादीशुदा को अब तलक डरपोक कहा करते थे ।
बर्दाश्त की हद क्या है , शादी से सीखा ।।

पीछे को लिपटती है जलती हुई मशाल की लौ ।
ये सबक जिंदगी का , दादी से सीखा ।।

यूं तो सुकून से जलती है शमां कमरे में ।
गिरना - औ - संभलना,  आँधी से सीखा ।।

                                                     " प्रवेश "

2 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति!
    भइयादूज की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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    1. धन्यवाद श्रीमान ...
      आपको भी भैया दूज की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें |

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