मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, November 30, 2012

पेट की आग

पेट की आग 
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खाली पेट
किसी चिता से कम नहीं ।
इस चिता से निकली लपटें
झुलसा देती हैं ह्रदय  को ,
और
काला  धुआँ
सीधा पहुँचता है
मस्तिष्क में ।
भावनाएँ मर जाती हैं
ह्रदय झुलसने से ,
मस्तिष्क बंद कर देता है
सोचने का काम ।
फिर
सर्पिणी निगल जाती है
अपने ही बच्चों को ,
शेर घास खाने लगता है,
गाय बीनने लगती है
कचरे के ढेर से
प्लास्टिक की थैलियाँ
और
इन्सान उठा लेता है
कटोरा या हथियार ।
आखिर
शांत करना होता है
हर चिता को
और
पेट की आग को भी
बुझाना जरूरी है ।
                             " प्रवेश "

Monday, November 26, 2012

हाइकु - आम आदमी

हाइकु - आम आदमी 

आम आदमी 
इंजन से वंचित 
रेल का डिब्बा ।
                            " प्रवेश "

हाइकु - कोई बोली से

हाइकु - कोई बोली से 

कोई गोली से
छोड़ चला दुनिया
कोई बोली से ।
                          " प्रवेश "

Tuesday, November 20, 2012

पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?

पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?
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ये शहर इतना दंगाई क्यों है ?
यहाँ भाई का दुश्मन भाई क्यों है ?

हर कोई नफरत की मशाल लिये खड़ा है ।
मोहब्बत की लौ बुझाई क्यों है ?

बहू तो बेटी जैसी नहीं है यहाँ ।
बेटे सा मगर जमाई क्यों है ?

कोई किसी की सुनता ही नहीं ।
तो बेवजह मुँहबजाई क्यों है ?

सुकून दिली तमन्ना है अगर ।
कायदों में इतनी ढिलाई क्यों है ?

आधे बदन उघाड़े फिरते हैं ।
कपड़े से महँगी सिलाई क्यों है ?

देखिये तो सही लड़खड़ाते कदम ।
जब पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?

                                            " प्रवेश "

Thursday, November 15, 2012

बरबादी से सीखा

बरबादी से सीखा
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गुलिस्तां ने सँवरना, बरबादी से सीखा ।
झगड़े से निकलना , फसादी से सीखा ।।

ताउम्र जो क़ैद को मुकद्दर समझता रहा ।
गुलामी का दर्द क्या है, आजादी से सीखा ।।

शादीशुदा को अब तलक डरपोक कहा करते थे ।
बर्दाश्त की हद क्या है , शादी से सीखा ।।

पीछे को लिपटती है जलती हुई मशाल की लौ ।
ये सबक जिंदगी का , दादी से सीखा ।।

यूं तो सुकून से जलती है शमां कमरे में ।
गिरना - औ - संभलना,  आँधी से सीखा ।।

                                                     " प्रवेश "

Saturday, November 10, 2012

शुभ दीपावली

शुभ दीपावली 

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गुजरे सालों की तरह फिर से  दिवाली आयेगी ।
फितरतन इस साल भी वैसे ही खाली जायेगी ।।

हावी हो जायेगी त्यौहार पर फिर मुफलिसी ।
बमुश्किल बच्चों की हालत संभाली जायेगी ।।

इस दफा भी बच्चों को बाजार ना ले जाऊँगा ।
सरेबाजार बेवजह इज्जत उछाली जायेगी ।।

हिम्मत नहीं जुटती है थोड़ी उधारी करने की ।
न चुका पाऊँ तो  मेरी बच्ची उठा ली जायेगी ।।

कुछ रौशनी कर लूँगा उपले जलाकर आँगन में ।
कहने को अपनी भी दिवाली मना ली जायेगी ।।

                                                         " प्रवेश "

Tuesday, November 6, 2012

जब शादीशुदा हो जाओगे

जब शादीशुदा हो जाओगे 

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कुछ इस तरहा हो जाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

खाना भी बनाना सीखोगे 
बर्तन भी धोना सीखोगे 
धोबी भी कभी बन जाओगे  
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

सब मौज तुम्हारी जायेगी 
हर शाम को शामत आयेगी 
डर से घर जल्दी आओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

हर हफ्ते खरीदारी होगी 
सिनेमा की तैंयारी होगी 
लम्बी जेबें सिलवाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

फिर याद करोगे दिन बीते 
जब शेर की तरहा थे जीते 
भीगी बिल्ली बन जाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

ये बात अभी ना मानोगे 
जल्दी सच को पहचानोगे 
फिर औरों को समझाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।
                                         " प्रवेश "