मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, October 9, 2012

सांड और बैल

सांड और बैल 

अय्याश और आवारा सांड
धिक्कारता रहा ,
ताने देता रहा
गाडी में जुते बैल को
और दिखता रहा झूठी शान
अपने निठल्लेपन की ।

शाम हुई ,
सांड भटकता रहा
दर - ब - दर
टुकड़ों के लिये
और रात बितायी
सर्दी में ठिठुरकर ,
पौलिथिन खाकर ।

बैल को
छप्पर मिला और
खल में सना हुआ चारा ।

मेहनत करने वाले
कभी भूखे नहीं सोते
मगर
हर बैल की किस्मत
एक सी नहीं होती ।

छप्पर के संग चारा
और चारे के संग छप्पर
किस्मत वालों को नसीब होता है ।
                                                     
                                       " प्रवेश "

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