मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Tuesday, September 4, 2012

भूख बनाम दोस्ती

भूख बनाम दोस्ती 

दो  बछड़े ,
नन्हे मगर पक्के  दोस्त ,
एक साथ घूमते सारा बाजार ,
तब पेट भर जाता था 
महज केले के छिलकों से ।
अब बछड़े , बछड़े  ना रहे 
सांड  हो गये ,
दो हिस्सों में बँट गया बाजार ,
बँट गये इलाके ,
अब हिम्मत भी नहीं जुटती 
एक - दूसरे की सरहद छूने की ।
कोई बड़ी तो नहीं 
किन्तु ख़ास है
इस विभाजन की वजह ।
बाजार न बढ़ा 
बस भूख बढ़ गयी ।

                                 " प्रवेश "

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