मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, September 17, 2012

अक्लमंद नादान

अक्लमंद नादान 

बेपरवाह है दर्द से , अपना नहीं गँवाया है ।
बेदर्दी ने शौक से , बेजुबाँ काटकर खाया है ।।

ना आँत ना दाँत मुकम्मल हैं, गोश्त खाने के लिये ।
फिर भी बड़े पतीले में , लज्ज़त से पकाया है ।।

नादाँ नहीं बस बनता है , अकल  होकर  के भी नादाँ ।
पहचान है उसको गैरों की , अपना बच्चा नहीं खाया है ।।

मजहब की दलीलें देता है , भगवान की बातें करता है ।
खुद तो मालिक का बन्दा है , बकरा किसने बनाया है !!

भूलता  नहीं नहाना , छूकर कभी भी मुर्दे को ।
बस भूल जाता है मगर , कितने जिन्दों को खाया है ।।

                                                                                         "प्रवेश "

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