मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, September 29, 2012

आँसू

आँसू

यूं ही नहीं आते
आँसू किसी बहाने से ।
ये कुछ खोने से भी आते हैं
और आ जाते हैं कुछ पाने से ।
किसी बिछड़े के मिल जाने से ,
किसी अपने के बिछड़ जाने से ।
कभी मोती , कभी आँख का पानी
कई नाम मिले हैं आँसुओं को ज़माने से ।
ये हर आँख में बसते हैं
परहेज नहीं नये - पुराने से ।
छलक पड़ते हैं सूरमां की आँखों से भी
महज दो पलकों को आपस में मिलाने से ।
                                                                     "प्रवेश "

Wednesday, September 26, 2012

कुर्सी और जमीन

कुर्सी और जमीन 

जमीन से उठे
और कुर्सी पर बैठ गये ,
भूल गये 
कि कुर्सी जमीन पर टिकी है 
एकदम समतल जमीन पर ।
कोई सबक भी न लिया 
कुर्सी की फितरत से ,
टिकने   के लिये जरूरी  है 
समतल होना जमीन का ,
चारों पायों का बराबर होना 
और बैठने का सलीका ।
थोड़ी सी भी ऊँच - नीच 
और बेसलीकी 
गिरा सकती है 
ध ....ड़ा ...म्मम्मम से 
फिर उसी जमीन पर 
जिसे भुला दिया था 
कुर्सी मिलने पर ।
                                   "प्रवेश "




Friday, September 21, 2012

बुरा कह दे

बुरा कह दे 
चाहे बेवजह कह दे  
कोई तो बुरा कह दे ।

नाहक  वाह - वाही ना करे
गर हूँ तो बेसुरा कह दे ।

झूठा तो दिलासा ना ही दे ।
हूँ गैर तो  अलविदा कह दे ।

पत्थर तो बहुत पूजे हैं
कभी खुदा को भी खुदा कह दे |

चाहे ना बुरा बनना कोई
ये सोचे कि दूसरा कह दे |

चाहे बेवजह कह दे
कोई तो बुरा कह दे ।
                                          "प्रवेश "




Monday, September 17, 2012

अक्लमंद नादान

अक्लमंद नादान 

बेपरवाह है दर्द से , अपना नहीं गँवाया है ।
बेदर्दी ने शौक से , बेजुबाँ काटकर खाया है ।।

ना आँत ना दाँत मुकम्मल हैं, गोश्त खाने के लिये ।
फिर भी बड़े पतीले में , लज्ज़त से पकाया है ।।

नादाँ नहीं बस बनता है , अकल  होकर  के भी नादाँ ।
पहचान है उसको गैरों की , अपना बच्चा नहीं खाया है ।।

मजहब की दलीलें देता है , भगवान की बातें करता है ।
खुद तो मालिक का बन्दा है , बकरा किसने बनाया है !!

भूलता  नहीं नहाना , छूकर कभी भी मुर्दे को ।
बस भूल जाता है मगर , कितने जिन्दों को खाया है ।।

                                                                                         "प्रवेश "

Friday, September 14, 2012

रोने लगी हिंदी

रोने लगी हिंदी 

जागने लगे लोग , सोने लगी हिंदी ।
अंग्रेजी के जंगल में खोने लगी हिंदी ।।

अद्यतन दिखने की होड़ मचने लगी जब से ।
अपने घर में परायी होने लगी हिंदी ।।

हिंदी नहीं जानते तो नाक ऊँची होती है ।
जाने किस जनम का पाप ढ़ोने लगी हिंदी ।।

कभी माँ का दर्जा था , इज्जत से पूजी जाती थी ।
अब शराबी की लुगाई सी रोने लगी हिंदी ।।

सितम्बर आया तो मिली बिछड़े हुये अपनों से ।
फिर से हसींन सपने संजोने लगी हिंदी ।।

दादी के जन्मदिन सा हिंदी दिवस आया ।
जज्बातों के बवंडर में खोने लगी हिंदी ।।

अपने घर में परायी होने लगी हिंदी ।
अंग्रेजी के जंगल में खोने लगी हिंदी ।।
                                                                  "प्रवेश "

Monday, September 10, 2012

मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |


मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |
फुटबाल खेलता धरती से
सूरज को नहलाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

चंदा का मुखड़ा धोता हूँ
नदियों को राह दिखाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

गूंगा वक्ता बन जाता है
बहरे को गीत सुनाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

शेर भटकता जंगल में
गीदड़ को ताज पहनाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

पानी को पानी से धोकर
पानी को स्वच्छ बनाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

आशाओं का थैला लेकर
खुशियाँ तलाशने जाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

जात - धर्म की बेड़ी को
अपनेपन से पिघलाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

नफरत की दीवारों में
प्रेम की सेंध लगता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |
                                           "प्रवेश"

Wednesday, September 5, 2012

हाइकु - कौन अमर !

हाइकु - कौन अमर !

कौन अमर !

सब कुछ नश्वर ,

गम न  कर ।

                            " प्रवेश "

Tuesday, September 4, 2012

भूख बनाम दोस्ती

भूख बनाम दोस्ती 

दो  बछड़े ,
नन्हे मगर पक्के  दोस्त ,
एक साथ घूमते सारा बाजार ,
तब पेट भर जाता था 
महज केले के छिलकों से ।
अब बछड़े , बछड़े  ना रहे 
सांड  हो गये ,
दो हिस्सों में बँट गया बाजार ,
बँट गये इलाके ,
अब हिम्मत भी नहीं जुटती 
एक - दूसरे की सरहद छूने की ।
कोई बड़ी तो नहीं 
किन्तु ख़ास है
इस विभाजन की वजह ।
बाजार न बढ़ा 
बस भूख बढ़ गयी ।

                                 " प्रवेश "

Monday, September 3, 2012

हाइकु - जमीं से जुड़ा

हाइकु - जमीं से जुड़ा

कभी न उड़ा 

गगन चूमकर 

जमीं से जुड़ा   ।
                             "प्रवेश "

Saturday, September 1, 2012

उधारी


उधारी

तीन रुपये की
उधारी करके
टेप खरीदी थी
पाँच का नोट
चिपकाने के लिये ,
फिर वही फटा नोट चिपकाकर
उधारी चुकाई थी
और टॉफी खरीदी थी
तुम्हारे लिये
बचे हुये दो रुपयों से,
शायद तुम्हें याद हो |
खैर ! तुम्हें याद हो न हो
मुझे याद है
जिंदगी मे पहली बार
उधारी जो की थी |

                 " प्रवेश "