मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, June 15, 2012

जिंदगी हूँ


जिंदगी हूँ

जिंदगी हूँ , जिंदगी को क्या लिखोगे !
कभी साहिल कभी समंदर गहरा लिखोगे ।


हार जाओगे तो काली रात शायद, 
जीत जाओगे नया सहरा लिखोगे ।


तुम्हारी मर्जी से गर चलने लगूँ तो 
नई धूप का मुझको कोई  कतरा लिखोगे ।


मुआहिदा करना पड़े मुझसे अगर तो 
दुश्मन -ए -  रौशनी कुहरा लिखोगे ।


बदलते हो रोज मेरे मायने तुम 
आज कुछ , जाने कल क्या - क्या लिखोगे ।


                                                      प्रवेश 

Wednesday, June 13, 2012

नशामुक्त परिवार

नशामुक्त परिवार 

बिगड़े हालातों में कहीं सुधार ढूँढने निकला हूँ ।
मैं गाँव में एक नशामुक्त परिवार ढूँढने निकला हूँ ।।

करे परहेज , ना दे और ना ही ले दहेज़
लड़े बुराई से , ऐसा एक यार ढूँढने निकला हूँ ।

मेरे घर ना माँगे , अपने घर ना पूछे शराब
हो अगर कोई, मैं ऐसा रिश्तेदार ढूँढने निकला हूँ ।

बेख़बर पड़ोसी रहते हैं , प्रेमभाव गायब सा है 
नफरत से सजी दुकानों में, मैं प्यार ढूँढने निकला हूँ ।

है दूर बहुत साहिल मगर , हौंसला भी मैं हारा नहीं
मँझधार में डगमग कश्ती की पतवार ढूँढने निकला हूँ ।

पहले भी मैं ढूँढा किया , जाने तलाश कब ख़त्म हो
इन छोटी - छोटी चीजों को हर बार ढूँढने निकला हूँ ।
मैं गाँव में एक नशामुक्त परिवार ढूँढने निकला हूँ ।


                                                               प्रवेश