मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, May 4, 2012

रोटी के जुगाड़ में


रोटी के जुगाड़ में 


मिट्टी जो कभी आई थी , बहकर के बाढ़ में ,

सौदा उसी का तय हुआ , रोटी के जुगाड़ में ।


पुरखों ने अपनी जान से ज्यादा जिसे चाहा ,

कौड़ियों के भाव बिक गयी , बेबसी की आड़ में ।


ख्वाब तो मेरे भी थे , शीशे के महल के ,

अब झोंपड़ी जर्जर पड़ी , निरे उजाड़ में ।


सोचता हूँ चुनाव लड़कर , घोटाला बड़ा करूँ ,

फिर ऐश से बसर हो , बैठे तिहाड़ में ।



                                         प्रवेश 

1 comment:

  1. khwab sabhi sanjote hai par kismat sabkit ek jaise nahi hoti.. aur ghotale karna shayad sankarik parampara mein samahit hota hai...
    bahut badiya samyik chintan karati rachna ..

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