मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, April 23, 2012

इससे पहले कि दम निकले

इससे पहले कि दम निकले

इससे पहले कि दम निकले ,

नेकी की ओर कदम निकले ।


कोशिश करो , दे पाओ ख़ुशी ,

जिंदगी से सबकी गम निकले ।


मैं ना रहे , अहम् ना रहे ,

अगर निकले तो हम निकले ।


वादे तो बदनाम हैं टूटने के लिये ,

कभी ना टूटे वो कसम निकले ।


बसंत भी सदा नहीं रहता ,

सदाबहारी का वहम निकले ।


गर्दिशों में भी  जोश कम ना हो ,

चोट पड़े तो लहू गरम निकले ।


फकीर ही नहीं , दाता भी बन ,

ज्यादा ना सही तो कम निकले ।


खुदा नहीं तू , खिलौना भर है ,

दिलोदिमाग से ये भरम निकले ।


प्रवेश 

3 comments:

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  3. कुछ जोड़ने की गुस्ताखी कर रहा हूँ, गुस्ताखी माफ़ .... अर्ज किया है :~~

    इरादों की बुलंदी का गीत गाते थे जो,
    दरअसल वो 'कोफ्ता-ए-दिल-नरम' निकले ।

    शर्म-शर्म कहते थे, सच कुछ और था,
    अजी वो हजरत तो बड़े ही बेशर्म निकले ।

    इस हाथ दे उस हाथ लेना है यहाँ पर,
    यहीं पर समूचा "हिसाबे-ए-करम" निकले ।

    फकत नेकी-बदी जाएगी साथ हमारे,
    और कुछ साथ जायेगा ये 'भरम' निकले ।

    हमने हमेशा ही वफाओं के गीत गाये,
    पर वो जालिम तो बेवफा सनम निकले ।

    सिकन्दर दुनिया में ख़ाली हाथ आया,
    उसका जनाजा देखा 'हाथ' ख़ाली निकले ।

    पैदा होना, मरना फिर जनम लेना हुआ,
    "मुकम्मल" मरने में कई जनम निकले ।

    मरने से पहले मरना, ये बात है गलत,
    भरपूर जीलें तब जाके कहीं दम निकले ।

    https://www.facebook.com/ASHOK.KUMAR.JAISWAL.1960

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