मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, April 16, 2012

रचनाधर्मिता

रचनाधर्मिता 

पाठक
मशक्कत करे
भौंहें सिकोड़े
पसीना बहाये
समझने के लिये
किसी रचना का भाव
या
खुद -ब - खुद
सपष्ट होता चला जाय
जैसे गिर जाती है
पीली पड़ चुकी पत्ती
स्वतः ही डाल से ,
पानी दौड़ पड़ता है
ढलान की ओर ।
कौन सी रचना
खरी उतरती है
रचनाधर्मिता पर !!!

                      प्रवेश 

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