मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, April 12, 2012

मोहतरमा दफ्तर जाने लगी हैं


मोहतरमा दफ्तर जाने लगी हैं

मोहतरमा दफ्तर जाने लगी हैं ,

घर खर्चे में हाथ बँटाने लगी हैं ।


मेरा बटुआ टटोलना बंद हुआ ,

अब तो खुद ही नोट दिखाने लगी हैं ।


चेहरे से घूँघट का परदा हटा है ,

अब चाँद सी नजर आने लगी हैं ।


मेरे हाथ की चपाती पसंद नहीं उनको ,

चपाती का आटा गुंधवाने लगी हैं ।


कपड़े धोना भी आता नहीं मुझको ,

शुरुआत में साबुन ही लगवाने लगी हैं ।


सुबह वाली बिस्तर की चाय बंद हो गयी ,

कोहनी मारकर हमको जगाने लगी हैं ।


घरेलू कामों का ढब कहाँ मुझको ,

अब डाँट डपटकर सिखाने लगी हैं । 



                                         प्रवेश 


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