मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, February 27, 2012

कहाँ मिलेंगी किताबें ?


कहाँ मिलेंगी किताबें ?


जो भी लिखा है 

उससे संतुष्ट नहीं हूँ मैं 

उत्कृष्ट कृति का आना 

बाकी है अभी ।


मगर एक विचार आया 

जितना लिखा है 

एक किताब छपवा दूँ 

अपने नाम के साथ ।


जोड़ -तोड़ कर 

इंतजाम किया 

धनराशि और प्रकाशक का 

किताब के लिये ।


एक बिजली सी कौंधी 

मस्तिष्क में 

एक प्रश्न आया 

तकनीक के इस युग में 

जब कंप्यूटर और अंतर्जाल 

फ़ैल रहा है 

अमरबेल की तरह ,

लैपटॉप पहुँच चुका है 

हमारी रजाई में ,

यहाँ तक कि 

पाखाने में भी ,

तो आने वाले समय में 

कहाँ मिलेंगी किताबें ?


बच्चों की पढाई के कमरे में 

किसी मेज पर या कुर्सी पर ,

किसी अलमारी की दराज में ,

या बैठक कमरे में सोफे पर ,

घर के सामने 

बगीचे में रखी बेंच पर 

या हरी - हरी घास पर !

शायद इनमे से कहीं नहीं !

तो फिर कहाँ मिलेंगी ?


एक जगह जहन में आयी है 

निचली मंजिल में अंतिम छोर पर 

वो छोटी सी कोठरी ,

जहाँ दादी की खाट लगी है 

और एक लाल बल्ब जलता है

अँधेरा चीरने को ।

वहीँ कहीं दाल के पीपे के ऊपर 

पड़ी मिलेंगी कुछ 

और कुछ कोने में खड़े 

बोरे में बंद ,

कुछ पसरी होंगी 

दादी की खाट के नीचे ।

भला और कहाँ मिलेंगी किताबें ?


प्रवेश 

Thursday, February 23, 2012

थोड़ी कड़वाहट


थोड़ी कड़वाहट


स्वर्ण रजत हीरे जड़ित, मखमल सेज सहेजि।

चिरनिद्रा के वास्ते वही काठ की सेजि ।। १ 


नाना प्रसाधन भये , जे रखि रूप निखारि ।

ऐसे ना साधन भये , जे चित्त देइ सुधारि ।। २ 


प्रवेश दुनिया बावली , छूकर मृत नहात ।

अरु जीवित को करि मृत , बड़े चाव से खात ।। ३


सम्बन्ध सकल सवारथी, तकैं काल की राह ।

निकरि आवै शुभ काज तो , करैं टाल की चाह ।। ४


मन पावन नाही किया , वस्त्र गेंहुएं ओढ़ ।

कृत्रिम खाल चढ़ाय ली , असल खाल में कोढ़ ।। ५ 


प्रजा बात करे हक़ की, याद दिलाते लीक ।

राजा चाहे जो करे , सब कानूनन ठीक ।। ६


मात - पिता का मशवरा , समझ न लीजै डाँट । 

ज्यों सुन्दर उद्यान में , बहुत जरूरी  छाँट ।। ७ 


पौंध लगाईं एक ना, जीवनपुर के गाँव ।

आयि दुपहरी जेठ की, कह कित पावै छाँव ? ८


फँसती जाती पंक में , सुरनद करे विलाप ।

नर - नर की खातिर खाई , खोदै अपने आप ।। ९


जलत-जलत वन जल बिना, शाख -पात जल जात ।

भूमि तले जड़ ना जलै, जल मिलि पुनि नव पात ।। १० 


तू - तू करता जो चला, पहुँचा तेरे पास ।

जो मैं - मैं करता चला, खायी गल की फाँस ।। ११


अर्थ - अर्थ का फेर है , अर्थ सगे सब खैर ।

अर्थ सगे आनन्द है , अर्थ सगे ही बैर ।। १२ 


संगत बड़ी कमाल की , असर न  खाली देत ।

एक तोता भजे राम को , दूजा गाली देत ।। १३


कल - कल में कल गया , कल - कल में आज ।

कल में ही कल जायेगा , कल में तख़्त -ओ- ताज ।। १४


जो जी ना हारे कभी, जीना हार पहिराय ।

जीना ऊपर ले चले , जीना नीचे लाय ।।  १५


टुकड़े - टुकड़े करि कथा , कविता लई बनाय |

देखि आप की दुर्दशा , कविता नीर बहाय || 16

हिन्दी - हिन्दी सब कहें , इक पखवाड़े धूम |

शेष साल हिन्दी रहे , अपनों से महरूम ||  17


दे हरि दे हरि जग कहे , हरि की चौखट छाड़ि |

हरि देहरि जो जात है , हरि दे छप्पर फाड़ि || 18


शुद्ध लिखी जो वर्तनी , उच्चारण में जान |

भाव मिले जो चाहिये , रचना को सम्मान || 19

चला नाक के सीध में, पहुँचा हरि के द्वार ।

दाहिन - बाहिन जो चला, माया के बाजार ।। 20

असी बरस की जिंदगी , एक ही पल की मौत ।

दोनों का रिश्ता अहो , ज्यों घरवाली - सौत ।। 21

दीमक बरगद खा गयी , लौह खा गयी जंग ।

ईर्ष्या मन को खा गयी , चिन्ता नयी उमंग ।। 22

नहीं समझ तो ना चले , उपदेशों से काम ।

ज्यों गंजों की दौड़ में , कंघी मिले इनाम ।। 23

राह भले ही हो कठिन , चले चलो चुपचाप ।

मंजिल चूमेगी कदम , शिखर छुओगे आप ।। 24

लक्ष्य रहे निगाह में , मन में हो उल्लास ।

जो चले वो पहुँच गये , ठहरे हुये निराश ।। 25

हरी - हरी दो दिन मिले , नयी गाय को घास ।

तीजे दिन डंडा मिले , चौथे दिन उपवास ।। 26

उमर गयी करते हुये , जमा खर्च की बात ।

जमा किया जिनके लिये , वही मारते लात ।। 27

जैसे आंधी में हवा , लहरों में तूफ़ान ।

जैसे सूरज में चमक , वैसे तन में प्रान ।। 28

मन मलिन मुख चन्द्र सम , अति कुटिल व्यवहार ।

ते ही सुन्दर जगत में , जे मन बसि सुविचार ।। 29

रूप ना देखो मीत का , देखि लियो किरदार ।

बुरी नजर जब भी लगे , काजल देय उतार ।। 30

मैं - मैं करि बकरी मरी , उल्टी छुरी हलाल ।

मैं से ही हो जायगा , बकरी जैसा हाल ।। 31

राजनीति ना है बुरी , बुरे आ पड़े लोग ।

परमारथ को त्यागकर , लक्ष्य हो गया भोग ।। 32

जड़ना हो आरोप तो , हिंदी से शुरुआत ।

और सफाई के बखत , अंग्रेजी में बात ।। 33

दाँत गड़े खट्टा लगे , खाकर आये स्वाद ।

आँवल के लक्षण जैसी , दादी जी की बात ।। 34

सभी फूल ना फल बनें , सब फल ना आहार ।

सभी बीज ना तरु  बनें , सब तरु ना फलदार ।। 35


लिखते - लिखते लिख दिया , नश्वर यह संसार |

प्रेम अमर है सर्वदा , जीवन का यह सार || 36


पानी तू ही प्रेमिका, पानी तू ही सौत |


पानी से ही जिंदगी, पानी से ही मौत || 37


वक्ता ऐसा चाहिए, खींचे सबका ध्यान |

बड़बोलापन ना रहे, बातों में हो ग्यान || 38


खोलन चाहूं दर्द हो, बंद करूँ तो चैन |

कंप्यूटर के सामने , ज्यादा दुखते नैन || 39


चुप रह जाना है कला, चुप रहना इक रोग |

चुप रह जाने के लिये, करें साधना लोग || 40


सही समय पर नींद ले, सही समय पर जाग |

असमय करते काज जो, रहती भागमभाग || 41


अच्छा लगने के लिये, अच्छा कीजे काम |

अच्छा - अच्छा बोलिये, जग में होगा नाम || 42


महँगा जूता पहनकर, ठक- ठक- ठक- ठक जाहि |

नजर धरा पर ना रही, मुँह की ठोकर खाहि || 43


ठण्डी - ठण्डी है हवा, ठण्डा - ठण्डा घाम |

सोते रहते भास्कर, करते अति विश्राम || 44


सुखदायी रजाई है, पीड़ा देत समीर |

पंछी भी नहीं चाहते, सुबह त्यागना नीड़ || 45


                                                 प्रवेश 

Saturday, February 18, 2012

The show must go on


The show must go on

If I am there

Or not

Doesn't matter,

Matters a lot.


Doesn't matter

For unknown 

Neither entity

Nor clone.

No feeling

No personal touch

Why to matter

In case such.


Matters a lot 

To dearest one,

Had good time

Lot of fun.

To my parents 

And dear friends,

Carry customs 

And trends.


No can fill 

The vacuous space,

At any cost

In any case.

But any weather

Any zone,

The Show must

Go on.

                        Pravesh 

Thursday, February 16, 2012

सास सास ना रही


सास सास ना रही 


सास सास ना रही 

उतनी भी ख़ास ना रही 

वो रौब न रहा 

बहू को खौफ ना रहा |

न जाने क्या बात  हुई 

कैसे कहानी पलट गई 

सास नरम हो गई 

बहू गरम हो गई 

सास का स्तर गिर गया 

या बहू का सर फिर गया !!

सास के बंद ताने 

बहू के शुरू गाने 

सास भी झूमे 

दोनों साथ में घूमें |

सास हुंकार भरती थी

बहू बिल्ली सी डरती थी

अब बहू जोर से बोले 

तो सास मुँह ना खोले |

कैसे कहानी 

एकदम से टर्न हो गयी !

कहीं ऐसा तो नहीं कि 

सास भी मोडर्न हो गयी !!?

                      प्रवेश  

Monday, February 13, 2012

लिखो.. तो जानें


लिखो.. तो जानें




बहुत सुना है

नाम तुम्हारा 

कोई भी विषय हो 

तुम लिख देते हो 

अकाट्य और कालजयी |

जो लिख दिया 

वो अमर हो गया 

किसी में इतना ज्ञान नहीं 

कि निकाल सके 

कोई मीन मेख 

तुम्हारी रचना में |

कोई प्रश्न ही नहीं उठता 

तर्क - वितर्क का ,

तुमने लिखा और 

पत्थर की लकीर हो गया ,

मैंने सुना है |

मगर 

एक आग्रह है ,

तुम लिखो 

मेरे दिये विषय पर ,

पृष्ठ की सीमा नहीं 

लिखो सहस्त्रपृष्ठीय 

सहस्त्र ग्रन्थ 

किन्तु ध्यान रहे 

कोई ये ना कहे 

कुछ कमी रह गयी |

......विषय .... 

वही चिर परिचित 

...... माँ .........


                        प्रवेश

Friday, February 10, 2012

मेरे सरकार


मेरे सरकार


चेहरे बदल जाते है 

सिंगार  बदल जाते हैं |

दीवारों पर चस्पे 

इश्तहार बदल जाते हैं |


लुभावने वादों की 

घोषणाएँ नहीं बदलती |

उम्मीदें नहीं बदलती 

उम्मीदवार बदल जाते हैं |


योगी - भोगी -वैरागी 

अलग ही रंग में होते हैं |

चुनावी मौसम में सारे 

त्यौहार बदल जाते हैं |


नये रिश्ते उपजते हैं 

पुराने हो चले धूमिल |

पाँच साल में एक बार 

रिश्तेदार बदल जाते हैं |


गाड़ी से हाथ हिलाने वाले 

गिरने लगते हैं पैरों पर |

चुनाव के बखत कैसे 

संस्कार बदल जाते हैं |


चुनाव ख़त्म, गद्दी हासिल 

चारों ओर फिर सूनापन |

पाँच साल के लिये 

मेरे सरकार बदल जाते हैं |


                                  प्रवेश

Tuesday, February 7, 2012

रेत का टीला


रेत का टीला 

बेचारा

रेत का टीला 

तरसता  

अपने अस्तित्व को,

अपने ही जहाँन  में 

निरे रेगिस्तान में |

हवा की मनमानी ,

बेबस 

रेत का टीला 

थोड़ी जिद करे 

जब हो गीला ,

मगर कब तक !!

चुपचाप 

चल देता है  

जहाँ भी ले जाना चाहे 

हवा की एक डाँट 

फिर बन्दर बाँट 

कुछ इधर छितरी 

कुछ उधर 

और रेत का टीला 

रेत में गुम |

फिर चारों ओर

रेत ही रेत 

मगर टीला कहाँ 

सिर्फ रेतीला खेत |

                                     प्रवेश