मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, January 20, 2012

मेरा दीवानापन अलग है

मेरा दीवानापन अलग है

कभी साथ ही खेला किये खाया किये हम |
अब जवानी की बात है, बचपन अलग है ||

क़यामत तक हमराह बनने की कसम क्या !
कहते नहीं क्यों अब तुम्हारा मन अलग है ||

नजर आये तुम्हे कुछ और ही शीशे में शायद |
अब ये ना कह देना कि ये दरपन अलग है ||

तुम नही हो आज तो तनहा नहीं मैं |
महफ़िलें हैं और सूनापन अलग है ||


दीवाने हैं मगर खुद सा दीवाना समझ ना लेना |
तुम्हारी दीवानगी से मेरा दीवानापन अलग है ||

                                                        प्रवेश 

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