मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, December 31, 2012

मारिये शैतान को मन के ही कारागार में

न दिखइये न छापिये
बस खबर ही अख़बार में ।
कबहूँ तो भीतर झाँकिये
ह्रदय के संसार में ।।

झकझोरिये - धिक्कारिये
दुत्कारिये दुष्कर्म को ।
बोइये इंसानियत
बंजर पड़े व्यवहार में ।।

कुंद मन की भावना को
धार लगवा लीजिये ।
या धार लगवा लीजिये
जंग लगी तलवार में ।।

फिर कभी बनने न पाये
कोई बेटी दामिनी ।
भरिये संवेदनाएँ भी 
बेटों के संस्कार में ।।

विधि के रोके क्या रुकेंगे
हृदयविदारक हादसे !
मारिये शैतान को
मन के ही कारागार में ।।
                                " प्रवेश "



Saturday, December 29, 2012

आज गम है कि कोई गम नहीं

कल गम था कि गम कम नहीं ।
आज गम है कि कोई गम नहीं ।।

सुधर गया वो सितमगर कैसे !
या ढाने लायक कोई सितम नहीं ।।

दिल वीरां है , हँसी लब पे है ।
ये और बात है  आँख नम नहीं ।।

मुझे यकीं है वो आसान मौत बख्शेगा ।
मेरा महबूब इतना भी बेरहम नहीं ।।

लगता है ज़मीर मर गया शायद ।
ये कैसा खून है , जो खौलकर गरम नहीं ।।

                                          " प्रवेश "

Friday, December 21, 2012

अलग - थलग

आकर मेरे पास वो , करने लागी बात ।
नैन गड़ाये नैनों में , हाथों में ले हाथ ।।
हाथों में ले हाथ, चिकनी चुपड़ी लगाई ।
चालबाजी उसकी मुझे, जरा समझ न  आई ।।
कहे 'प्रवेश' देखा नहीं , ऐसा कभी फरेब ।
नैन गड़ाये नैनों में , काट गयी वो जेब ।।   1 ।।

बीवी मइके भाग चली , आकर मियाँ  से तंग ।
कह गयी अब न रह सकूं , कभी तुम्हारे संग ।।
कभी तुम्हारे संग , लौटकर ना आऊँगी ।
इससे अच्छा किसी कुएँ में, डूब के मर जाऊँगी ।।
कहे ' प्रवेश ' एक शर्त है , जो  पाना चाहो बीवी ।
जल्दी से केबल लगवा लो , ले आओ एक टीवी ।।   2 ।।

जुर्म हुआ संगीन और धरे आरोपी पाँच ।
किसकी कितनी भागीदारी , पुलिस कर रही जाँच ।।
पुलिस कर रही जाँच , किसने लूटी अस्मत ।
किसने हाथापाई की , किसकी फूटी किस्मत ।।
कहे ' प्रवेश ' जनता करे , फाँसी की फरियाद ।
जिसकी जुर्म की सोच हो , करे ये सजा याद ।।   3 ।।

पुलिस कर रही शक्ति का , अनुचित इस्तेमाल |
जिसने भी आवाज की , उसकी खींची खाल ||
उसकी खींची खाल , जो हक की बात करे |
न्याय की माँग करे , उन पर आघात करे ||
कहे प्रवेश पुलिस की , जनता से क्या रंजिश |
फर्ज निभाये फर्ज से , साथी बने पुलिस || 4 ||

जनता चिंता कर रही , अरु चिंतन सरकार |
पाँच साल फिर से कैसे , होगा भ्रष्टाचार ??
होगा भ्रष्टाचार , ये बात तो तय है |
लेकिन कौन करेगा , अभी थोड़ा संशय है ||
कहे प्रवेश समेट लो , जिसका जितना बनता |
इतना चिंतन ना करो , कहीं जाग न जाये जनता || 5 ||

दिल्ली पहुँचे जीतकर , ले वादों का बोझ ।
बोझा कैसे कम करें , शुरू हो गयी खोज ।।
शुरू हो गयी खोज , कैसे वादा निभायें ।
वादा गर निभायें , तो खुद कैसे कमायें ।।
कहे प्रवेश दही की , रखवाली करे बिल्ली ।
वादे सब फुर्र हो गये , जबसे पहुँचे दिल्ली ।। 6 ||


ठाठ उन्हीं के हो रहे , रहे जो तलवे चाट |
बाकी जनता कष्ट में , रही है जीवन काट ||
रही है जीवन काट , गम की बदली हट जाये |
आस लगाये बैठी है , बाकी अच्छी कट जाये ||
कहे ' प्रवेश ' योजनाओं की , चमचों में बंदरबाँट |
दुखियारों के दुख बढ़े , ठाठ वालों के ठाठ || 7 ||

पुलिस लाग री हाथ धोकर , सटोरियों कै गेल |
होण लाग रिया खेल में,  खेल कै भीतर खेल |
खेल कै भीतर खेल , जाणे सै कितनी मछली |
इब निकलेगी सूद समेत , सगड़ी आगली पिछली |
कहे प्रवेश हो रिया हैं , चालिस में घपचालिस |
देखण आली बात है , कठे पहुँचेगी पुलिस || 8 ||

मौज उड़ायें नेता जी, जनता झेले त्रास । 
लग जायेगी बद्दुआ , हो जायेगा नाश ॥ 
हो जायेगा नाश, कुछ भी नहीं बचेगा । 
फिर कोई खादीधारी, षड़यंत्र नहीं रचेगा ॥ 
कहे 'प्रवेश' जनता की, सेवा में लगी है फ़ौज । 
जब तक चोट नहीं लगे, करने दो इन्हें मौज ॥ 9 ॥ 

कविता से घर ना चले, करो गौर कविराज । 
कलम किनारे छोड़ के, सीखो घर के काज ॥ 
सीखो घर के काज, धन का अर्जन सीखो । 
बेमतलब की बातों का, जरा विसर्जन सीखो ॥ 
कहे 'प्रवेश' किस काम की, झूठी ज्ञान की सरिता!
बच्चे भूखे मर रहे, अब तो छोडो कविता ॥ 10 ॥ 

खाया बड़े ही चाव से, बिन पूछे ही भाव |
देख के पर्चा खर्चे का, हो गया दिल में घाव ||
हो गया दिल में घाव, कौन भरे ये खर्चा |
महँगा खाना खा गये, हुई ज़ोर की चर्चा ||
पूछत है प्रवेश, किस विधि से पकाया ?
इतने का खाना पहले, एक माह में खाया ||  11 ||

राम को पीछॆ जोड़कर, बड़ा बनाया नाम |
बड़े नाम की आड़ में, करे घिनौने काम ||
करे घिनौने काम, फिर भी सीना ताने |
विधि को भी ललकार दे, जाने किस बहाने !!
कहे प्रवेश सब सिद्ध है, पास अगर हो दाम |
बाकी ख़ुद ही झेलेगा, नाम के पीछॆ राम || 12 ||

लोक लुभावन वादों से जीत गये चुनाव |
वादे पूरे करने हैं तो खाने लगे हैं भाव ||
खाने लगे हैं भाव , करते पत्राचार |
पहले आप - पहले आप , नहीं बनी सरकार ||
ठगी - ठगी सी जनता को फिर रहे चुनाव में झोंक |
एक चुनाव से समझ रहे , जीत गये तिहुं लोक || 13 ||

वोट डालने जो गया , है वो जिम्मेदार |
जो घर से निकले नहीं, उनको लख धिक्कार ||
उनको लख धिक्कार, मानते वोट मजबूरी |
नहीं जानते लोकतंत्र में, है मतदान जरूरी ||
कहे प्रवेश जाकर हक से, करो वोट की चोट |
अंत समय तक भी अपना, देकर आओ वोट || 14||

                                               
   " प्रवेश "


Saturday, December 15, 2012

हालत बड़े बुरि छौ

हालत बड़े बुरि छौ 

खेति - पाति बुसी गे
सिसौंण छौ और कुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

कुण बाड़ खन्यार छीं
बीचम बे टुटी धुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

हाथम बोतल छौ  सबुकि
कमर हौन खुकुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

क्वे नि छौ गौं पन
मलिबाखई पनी का , तलिबाखई भुरि  छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।

ब्याव लूणम रौट खानी
दादागिरी पुरि छौ ।
हालत बड़े बुरि छौ ।
                           " प्रवेश "
       

Friday, December 14, 2012

न दारू न हकीमों की दवा काम आयेगी

न दारू न हकीमों की दवा काम आयेगी

न दारू न हकीमों की दवा काम आयेगी ।
जब भी आयेगी , माँ की दुआ काम आयेगी ।।

अब दिल को शहर की आबोहवा नहीं भाती ।
अब गाँव की ठण्डी हवा काम आयेगी ।।

तेरी बेवफाई का रंज नहीं मुझको ।
जो मैंने की है वो वफ़ा काम आयेगी ।।

भलाई जो भी करी , बेकार नहीं जायेगी ।
अभी ना तो, अगली दफा काम आयेगी  ।।

                                                     " प्रवेश "

Wednesday, December 12, 2012

क्रिकेट का मैदान है ये दुनिया

क्रिकेट का मैदान है ये दुनिया
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क्रिकेट का मैदान है ये दुनिया |
जिंदगी की पिच पर
मैच है तो पाँच दिन का
लेकिन नतीजा निकल आता है
चौथे ही दिन ।

संयम के साथ हर दिन
बहुत संभलकर खेलना होता है ।
अगर जीतना है शान से
तो शानदार प्रदर्शन जरूरी है
हर क्षेत्र में ।

बल्लेबाजी की कमजोरी
छिपाई जा सकती है
अच्छी गेंदबाजी से ,
और अच्छी बल्लेबाजी से
गेंदबाजी को बल मिलता है ।

जी जान लगा देनी होती है
क्षेत्ररक्षण में ,
और साथ ही जरूरी है
एक कुशल पथ - प्रदर्शक ।

भगवान साथ होने से ही
जीत हासिल नहीं होती,
मेहनती का साथ ही
जीत को पसंद है ।

जिंदगी जीना
कोई बच्चों का खेल नहीं ।
                                         " प्रवेश "

Saturday, December 1, 2012

पहाड़ है गीं खरण पट्ट


पहाड़ है गीं खरण पट्ट
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पहाड़ है गीं
खरण पट्ट ,
नौजवान है गीं
अरण पट्ट ।

कोई बार पढि बेर
कोई अनपढ़ हबेर ,
सब भाज मीं शहर होणि
आँख बुजि बेर ।

पहाड़ में कैक मन
लागण नि रौय ,
सबुकैं शहरौक
चाव चढि गोय ।

कोई पलटि बे नि देखुन
पहाडक उजियाणी,
लागि गे सबुकैं
शहरैकि खाणी  ।

ठण्डी हवा , ठण्डो पणिक
भुलि गयीं मोल ,
बुलान लै नि छीं अब ऊं
पहाड़ी बोल ।

भौत आस लगे  रै
बड़े धीरज धरि रौछ
पहाडुल आज लै
उनौर बाटो तकि रौछ ।
     
                     " प्रवेश "

Friday, November 30, 2012

पेट की आग

पेट की आग 
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खाली पेट
किसी चिता से कम नहीं ।
इस चिता से निकली लपटें
झुलसा देती हैं ह्रदय  को ,
और
काला  धुआँ
सीधा पहुँचता है
मस्तिष्क में ।
भावनाएँ मर जाती हैं
ह्रदय झुलसने से ,
मस्तिष्क बंद कर देता है
सोचने का काम ।
फिर
सर्पिणी निगल जाती है
अपने ही बच्चों को ,
शेर घास खाने लगता है,
गाय बीनने लगती है
कचरे के ढेर से
प्लास्टिक की थैलियाँ
और
इन्सान उठा लेता है
कटोरा या हथियार ।
आखिर
शांत करना होता है
हर चिता को
और
पेट की आग को भी
बुझाना जरूरी है ।
                             " प्रवेश "

Monday, November 26, 2012

हाइकु - आम आदमी

हाइकु - आम आदमी 

आम आदमी 
इंजन से वंचित 
रेल का डिब्बा ।
                            " प्रवेश "

हाइकु - कोई बोली से

हाइकु - कोई बोली से 

कोई गोली से
छोड़ चला दुनिया
कोई बोली से ।
                          " प्रवेश "

Tuesday, November 20, 2012

पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?

पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?
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ये शहर इतना दंगाई क्यों है ?
यहाँ भाई का दुश्मन भाई क्यों है ?

हर कोई नफरत की मशाल लिये खड़ा है ।
मोहब्बत की लौ बुझाई क्यों है ?

बहू तो बेटी जैसी नहीं है यहाँ ।
बेटे सा मगर जमाई क्यों है ?

कोई किसी की सुनता ही नहीं ।
तो बेवजह मुँहबजाई क्यों है ?

सुकून दिली तमन्ना है अगर ।
कायदों में इतनी ढिलाई क्यों है ?

आधे बदन उघाड़े फिरते हैं ।
कपड़े से महँगी सिलाई क्यों है ?

देखिये तो सही लड़खड़ाते कदम ।
जब पचती नहीं तो पिलाई क्यों है ?

                                            " प्रवेश "

Thursday, November 15, 2012

बरबादी से सीखा

बरबादी से सीखा
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गुलिस्तां ने सँवरना, बरबादी से सीखा ।
झगड़े से निकलना , फसादी से सीखा ।।

ताउम्र जो क़ैद को मुकद्दर समझता रहा ।
गुलामी का दर्द क्या है, आजादी से सीखा ।।

शादीशुदा को अब तलक डरपोक कहा करते थे ।
बर्दाश्त की हद क्या है , शादी से सीखा ।।

पीछे को लिपटती है जलती हुई मशाल की लौ ।
ये सबक जिंदगी का , दादी से सीखा ।।

यूं तो सुकून से जलती है शमां कमरे में ।
गिरना - औ - संभलना,  आँधी से सीखा ।।

                                                     " प्रवेश "

Saturday, November 10, 2012

शुभ दीपावली

शुभ दीपावली 

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गुजरे सालों की तरह फिर से  दिवाली आयेगी ।
फितरतन इस साल भी वैसे ही खाली जायेगी ।।

हावी हो जायेगी त्यौहार पर फिर मुफलिसी ।
बमुश्किल बच्चों की हालत संभाली जायेगी ।।

इस दफा भी बच्चों को बाजार ना ले जाऊँगा ।
सरेबाजार बेवजह इज्जत उछाली जायेगी ।।

हिम्मत नहीं जुटती है थोड़ी उधारी करने की ।
न चुका पाऊँ तो  मेरी बच्ची उठा ली जायेगी ।।

कुछ रौशनी कर लूँगा उपले जलाकर आँगन में ।
कहने को अपनी भी दिवाली मना ली जायेगी ।।

                                                         " प्रवेश "

Tuesday, November 6, 2012

जब शादीशुदा हो जाओगे

जब शादीशुदा हो जाओगे 

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कुछ इस तरहा हो जाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

खाना भी बनाना सीखोगे 
बर्तन भी धोना सीखोगे 
धोबी भी कभी बन जाओगे  
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

सब मौज तुम्हारी जायेगी 
हर शाम को शामत आयेगी 
डर से घर जल्दी आओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

हर हफ्ते खरीदारी होगी 
सिनेमा की तैंयारी होगी 
लम्बी जेबें सिलवाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

फिर याद करोगे दिन बीते 
जब शेर की तरहा थे जीते 
भीगी बिल्ली बन जाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।

ये बात अभी ना मानोगे 
जल्दी सच को पहचानोगे 
फिर औरों को समझाओगे 
जब शादीशुदा हो जाओगे ।
                                         " प्रवेश "

Tuesday, October 30, 2012

अब वो जमाना लद गया

अब वो जमाना लद गया 

कुर्सी गयी और पद गया ।
अब वो जमाना लद गया ।।

मधुमक्खियाँ बेघर हो गयीं ।
आँधी में छत्ता - शहद गया ।।

सलाम नहीं करते एहसानमंद भी ।
रुतबा गया और कद गया ।।

भला वक़्त नश्तर चुभोता है दिल पर ।
गुजरा ऐंश गैर के सरहद गया ।।

अब हालत हो गयी परकटे सी ।
परवाज का दायरा बेहद गया ।।

अब वो जमाना लद गया ।।
                                     
                               " प्रवेश "

Thursday, October 25, 2012

होशियार या हो सियार

होशियार या हो सियार

तुम होशियार या हो सियार !
हो अक्लमंद या मंद अक्ल!

तुम धूप सेंक सकते हो
लेकिन धूप चुरा नहीं सकते ।
तुम उजाड़ सकते हो चंदनवन
पर शीतलता पा नहीं सकते ।

नदी से पानी चुरा लो ,
क्या प्रवाह भी चुरा पाओगे !
तेलरहित दीपक हो तुम
प्रकाश कहाँ से लाओगे !

रे नपुंसको .. बच्चा चुराकर
बाप नहीं बन सकते हो ।
बातें करके बड़ी - बड़ी
प्रताप नहीं बन सकते हो ।

रचना चुरा तो सकते हो ,
रचनात्मकता ला नहीं सकते ।
शेर की जूठन खाकर के
शेर  कहला नहीं सकते ।

तुम होशियार या हो सियार !!
                                         " प्रवेश "

Friday, October 19, 2012

बेटी की विदाई

बेटी की विदाई 

एक रूह मेरी रूह से पराई हो रही है ।
आज मेरी बेटी की विदाई हो रही है ।।

कुछ अजनबी रिश्ते निभाने जा रही है लाडली ।
कुछ पुराने रिश्तों से रुसवाई हो रही है ।।

तुमको अकेला छोड़कर , बाबा कभी ना जाऊँगी ।
आज खुद के ही वादे से बेवफाई हो रही है ।।

एक आँसू भी सुहाता था ना उसकी आँख में ।
आज दहाड़े मारकर भरपाई हो रही है ।।

प्रेम का प्रसाद हर पल मिले ससुराल में ।
मौजूद हर दिल से , यही दुहाई हो रही है ।।

दहेज़ में ले जा रही है , पुलिंदा तहजीब का ।
डोली में सवार मेरी उम्र की कमाई हो रही है ।।

                                                          " प्रवेश "

Friday, October 12, 2012

हमेशा याद रहता है

हमेशा याद रहता है

कभी भूलता नहीं हूँ तुम्हें याद करना ।
तुम्हें भुलाना भी हमेशा याद रहता है ।।

याद है अच्छी तरह तेरा जिंदगी में आना ।
तेरा चुपके से चले जाना भी हमेशा याद रहता है ।।

डूब जाना तेरी झील सी आँखों की गहराई में ।
तेरी जुल्फों तले सो जाना भी हमेशा याद रहता है ।।

जब मुझको जुदाई का अँधेरा घेर लेता है ।
तेरे नाम का दीपक जलाना भी हमेशा याद रहता है ।।

हर आहट में तेरे आने के अहसास का होना  ।
दरवाजे से बैरंग लौट जाना भी हमेशा याद रहता है ।।

                                                                " प्रवेश "



जब मेरे शहर में चुनाव होते हैं

जब मेरे शहर में चुनाव होते हैं

रूठकर मायके गयी बिजली भी आने लगती है ।
नुक्कड़ पर पानी की टोंटी आँसू बहाने लगती है ।
टूटी पगडण्डी नये सपने सजाने लगती है ।
सड़क अपने चेहरे पर कालिख पुताने लगती है ।
दादी की रुकी हुई विधवा पेंशन आने लगती है ।
खादी बिजूकों के सामने भी सर झुकाने लगती है ।
एक शख्सियत लाशों को ढांढस बंधाने लगती है ।
हर गली से मय की भीनी खुशबू आने लगती है ।
कमली भिखारन सुबह - शाम  बिरयानी खाने लगती है ।
फिर जैसे - जैसे नतीजों की खबर आने लगती है ।
दो - चार महीनों की रौनक घर वापस जाने लगती है ।
                                                      
                                                           "प्रवेश "

Tuesday, October 9, 2012

सांड और बैल

सांड और बैल 

अय्याश और आवारा सांड
धिक्कारता रहा ,
ताने देता रहा
गाडी में जुते बैल को
और दिखता रहा झूठी शान
अपने निठल्लेपन की ।

शाम हुई ,
सांड भटकता रहा
दर - ब - दर
टुकड़ों के लिये
और रात बितायी
सर्दी में ठिठुरकर ,
पौलिथिन खाकर ।

बैल को
छप्पर मिला और
खल में सना हुआ चारा ।

मेहनत करने वाले
कभी भूखे नहीं सोते
मगर
हर बैल की किस्मत
एक सी नहीं होती ।

छप्पर के संग चारा
और चारे के संग छप्पर
किस्मत वालों को नसीब होता है ।
                                                     
                                       " प्रवेश "

Friday, October 5, 2012

तुम आये

तुम आये

कोई करिश्मा मेरे हमसफ़र हो गया ।
तुम आये, मकान मेरा घर हो गया ।।

खामोश हो गया है चीखता सन्नाटा ।
उसे तुम्हारी मौजूदगी  का डर हो गया ।।

तन्हां रहती थीं महफ़िलें तुम बिन ।
खुशनुमा  फिर से दर - ब - दर हो गया ।।

बुत भी करने लगे हैं गुफ्तगू सी ।
जाने ऐसा क्या असर हो गया ।।

हांसिये पर आ गया दौर - ए - गुमनामी ।
मेरी पहचान का सारा शहर हो गया ।।

                                                           "प्रवेश "

Saturday, September 29, 2012

आँसू

आँसू

यूं ही नहीं आते
आँसू किसी बहाने से ।
ये कुछ खोने से भी आते हैं
और आ जाते हैं कुछ पाने से ।
किसी बिछड़े के मिल जाने से ,
किसी अपने के बिछड़ जाने से ।
कभी मोती , कभी आँख का पानी
कई नाम मिले हैं आँसुओं को ज़माने से ।
ये हर आँख में बसते हैं
परहेज नहीं नये - पुराने से ।
छलक पड़ते हैं सूरमां की आँखों से भी
महज दो पलकों को आपस में मिलाने से ।
                                                                     "प्रवेश "

Wednesday, September 26, 2012

कुर्सी और जमीन

कुर्सी और जमीन 

जमीन से उठे
और कुर्सी पर बैठ गये ,
भूल गये 
कि कुर्सी जमीन पर टिकी है 
एकदम समतल जमीन पर ।
कोई सबक भी न लिया 
कुर्सी की फितरत से ,
टिकने   के लिये जरूरी  है 
समतल होना जमीन का ,
चारों पायों का बराबर होना 
और बैठने का सलीका ।
थोड़ी सी भी ऊँच - नीच 
और बेसलीकी 
गिरा सकती है 
ध ....ड़ा ...म्मम्मम से 
फिर उसी जमीन पर 
जिसे भुला दिया था 
कुर्सी मिलने पर ।
                                   "प्रवेश "




Friday, September 21, 2012

बुरा कह दे

बुरा कह दे 
चाहे बेवजह कह दे  
कोई तो बुरा कह दे ।

नाहक  वाह - वाही ना करे
गर हूँ तो बेसुरा कह दे ।

झूठा तो दिलासा ना ही दे ।
हूँ गैर तो  अलविदा कह दे ।

पत्थर तो बहुत पूजे हैं
कभी खुदा को भी खुदा कह दे |

चाहे ना बुरा बनना कोई
ये सोचे कि दूसरा कह दे |

चाहे बेवजह कह दे
कोई तो बुरा कह दे ।
                                          "प्रवेश "




Monday, September 17, 2012

अक्लमंद नादान

अक्लमंद नादान 

बेपरवाह है दर्द से , अपना नहीं गँवाया है ।
बेदर्दी ने शौक से , बेजुबाँ काटकर खाया है ।।

ना आँत ना दाँत मुकम्मल हैं, गोश्त खाने के लिये ।
फिर भी बड़े पतीले में , लज्ज़त से पकाया है ।।

नादाँ नहीं बस बनता है , अकल  होकर  के भी नादाँ ।
पहचान है उसको गैरों की , अपना बच्चा नहीं खाया है ।।

मजहब की दलीलें देता है , भगवान की बातें करता है ।
खुद तो मालिक का बन्दा है , बकरा किसने बनाया है !!

भूलता  नहीं नहाना , छूकर कभी भी मुर्दे को ।
बस भूल जाता है मगर , कितने जिन्दों को खाया है ।।

                                                                                         "प्रवेश "

Friday, September 14, 2012

रोने लगी हिंदी

रोने लगी हिंदी 

जागने लगे लोग , सोने लगी हिंदी ।
अंग्रेजी के जंगल में खोने लगी हिंदी ।।

अद्यतन दिखने की होड़ मचने लगी जब से ।
अपने घर में परायी होने लगी हिंदी ।।

हिंदी नहीं जानते तो नाक ऊँची होती है ।
जाने किस जनम का पाप ढ़ोने लगी हिंदी ।।

कभी माँ का दर्जा था , इज्जत से पूजी जाती थी ।
अब शराबी की लुगाई सी रोने लगी हिंदी ।।

सितम्बर आया तो मिली बिछड़े हुये अपनों से ।
फिर से हसींन सपने संजोने लगी हिंदी ।।

दादी के जन्मदिन सा हिंदी दिवस आया ।
जज्बातों के बवंडर में खोने लगी हिंदी ।।

अपने घर में परायी होने लगी हिंदी ।
अंग्रेजी के जंगल में खोने लगी हिंदी ।।
                                                                  "प्रवेश "

Monday, September 10, 2012

मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |


मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |
फुटबाल खेलता धरती से
सूरज को नहलाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

चंदा का मुखड़ा धोता हूँ
नदियों को राह दिखाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

गूंगा वक्ता बन जाता है
बहरे को गीत सुनाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

शेर भटकता जंगल में
गीदड़ को ताज पहनाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

पानी को पानी से धोकर
पानी को स्वच्छ बनाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

आशाओं का थैला लेकर
खुशियाँ तलाशने जाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

जात - धर्म की बेड़ी को
अपनेपन से पिघलाता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |

नफरत की दीवारों में
प्रेम की सेंध लगता हूँ ,
मैं शब्दचित्र बनाता हूँ |
                                           "प्रवेश"

Wednesday, September 5, 2012

हाइकु - कौन अमर !

हाइकु - कौन अमर !

कौन अमर !

सब कुछ नश्वर ,

गम न  कर ।

                            " प्रवेश "

Tuesday, September 4, 2012

भूख बनाम दोस्ती

भूख बनाम दोस्ती 

दो  बछड़े ,
नन्हे मगर पक्के  दोस्त ,
एक साथ घूमते सारा बाजार ,
तब पेट भर जाता था 
महज केले के छिलकों से ।
अब बछड़े , बछड़े  ना रहे 
सांड  हो गये ,
दो हिस्सों में बँट गया बाजार ,
बँट गये इलाके ,
अब हिम्मत भी नहीं जुटती 
एक - दूसरे की सरहद छूने की ।
कोई बड़ी तो नहीं 
किन्तु ख़ास है
इस विभाजन की वजह ।
बाजार न बढ़ा 
बस भूख बढ़ गयी ।

                                 " प्रवेश "

Monday, September 3, 2012

हाइकु - जमीं से जुड़ा

हाइकु - जमीं से जुड़ा

कभी न उड़ा 

गगन चूमकर 

जमीं से जुड़ा   ।
                             "प्रवेश "

Saturday, September 1, 2012

उधारी


उधारी

तीन रुपये की
उधारी करके
टेप खरीदी थी
पाँच का नोट
चिपकाने के लिये ,
फिर वही फटा नोट चिपकाकर
उधारी चुकाई थी
और टॉफी खरीदी थी
तुम्हारे लिये
बचे हुये दो रुपयों से,
शायद तुम्हें याद हो |
खैर ! तुम्हें याद हो न हो
मुझे याद है
जिंदगी मे पहली बार
उधारी जो की थी |

                 " प्रवेश "

Thursday, August 30, 2012

हाइकु - जवाब मिला

हाइकु - जवाब मिला

जवाब मिला
बनकर सवाल
नया बवाल  ।

                         " प्रवेश "

Tuesday, August 21, 2012

यूँ ही ..

कौन हाँकता है पराये खेत से ढोर !
कुछ यूं हो जाय तो खेत फिर पराया क्यों रहे || 1 

मुझे काफ़िर कह दे ऐ जमाने , कोई ऐतराज नहीं |
मज़हब के नाम पर इंसानियत से दगा न करवा || 2

मुझे सुधारने की तुमने ये जो जंग छेड़ी है ,
मेरी लाख कोशिशों के बाद भी तुम जीत जाओगी ।| 3

तुम गयी तो मुझे कोई ग़म ना हुआ ।
तुमने तो आते ही कहा था " लो मैं आ गयी " ।। 4

दिन भर के जश्न की भी अब शाम होने को आई है |
फिर मुद्दा भ्रष्टाचार का फिर वही महँगाई है || 5

दीवाना नही हूँ मगर दर्द जानता हूँ |
दीवाना होता तो बस फिर दीवाना होता || 6

नौ दिन बीते लिफ्ट के इंतजार में |
चलो अब छत पर जीने से चढा जाये || 7

राह तरक्की की इतनी भी मुश्किल न थी |
बस नाम के पिछले हिस्से से मात खा गये || 8

तुम हार लेना हराकर मुझे |
मुझे हारना है तुम्हें जीतकर || 9

वही जूतियाँ पहनते हैं शग़ल के लिये |
जिन्हें काँटों भरी राह पर चलना नहीं होता || 10

वो इस दफा मिले , बिलकुल बेगानों की तरह ..
खैर.. कोई बात नहीं .... उमर का तकाजा है ।। 11

दवा कोई भी हो , बेअसर ही जाती है ।
हम गरीबों पर कीमत का असर होता है ।। 12

जमाने के दिये जख्म भी बखूबी भरता है ।
वक़्त सा असरदार कोई मरहम नहीं देखा ।। 13

कोई दिल में घुस आया है , दीवारें फाँदकर ..
दिल का दरवाजा खुला छोड़ देने के बाद || 14

बहुत संभल - संभलकर बोलते हैं लोग ।
झूठ छिप न जाये , सच निकल न जाये ।। 15

जंग हुई नहीं और जंग खा गयी ..
तलवार भला और काम आती भी क्या || 16

वो अकड़कर देता रहा आवाज वक़्त को ...
दूसरा रुका नहीं , पहला झुका नहीं || 17

फेसबुक पर जता रही , जनता प्रकृति प्रेम ।
ना बोई गुठली आम की , ना ही बोई सेम ।| 18

शोक मनाती हवा आई है जंगल से अभी ,
लगता है फिर से कहीं कोई पेड़ कटा ।| 19

जलती सिगरेट फेंककर मतवाला चला गया ।
कलेजा खुद का और आशियाँ किसी का जला गया ।। 20

लोहे की क्या मजाल कि कटार   बन जाये ।
बिना ढाले - तराशे  ढाल या तलवार बन जाये ।| 21

मियाँ हम तो कर चुके हैं कोशिशें तमाम |
खुदा ही जाने कि उनको यकीन कब हो || 22

सुना है , तुमने पढ़ी है प्रेम की पाती |
भले ही मुझे न आती , ये भाषा तुम्हें तो आती !! 23

कभी बेटी, कभी प्रिया, कभी माता, कभी बहना |
नारी तेरे रूप अनेक , हर एक रूप का क्या कहना || 24

बिल्ली के जिम्मे , दही की हिफाजत ,
दही का हिसाब , भला मिलेगा कैसे !! 25

शायद इस बार हमें , मनाना नहीं आया |
वरना वो इस कदर, कभी रूठते ना थे || 26

ना छेद था कश्ती में , ना लहरों से टकराई |
कुछ अपने भी थे सवार , डूबने की वजह || 27

चलते चले जाना या ठहराव है जिंदगी |
दोनों ही मुसाफिरों को बेचैन पाया है || 28

पलट - पलट पोथियाँ , उम्र भी ढलने को है |
जिंदगी का सबक , मगर अधूरा है आज भी || 29

न दौरा पड़ेगा दिल का , न जुकाम न बुखार से ।
जिया हूँ प्यार से , जान जायेगी प्यार से ।। 30

शब्दरहित है शब्दकोष , एक भी शब्द कहाँ से लाऊँ ।
माँ तेरा वर्णन करने को, कोई शब्द जुटा ना पाऊँ ।। 31

हाथ ऐसे ना मिले जो एक निवाला दे सकें ।
हमदर्दी दुनिया को है जर्जर तस्वीरों के लिये ।। 32

कक्षा में यदि हो खड़ी , तो डाँट कर बिठाते हैं ।
और अगर ना हो खड़ी , तो दफ्तर से मँगाते हैं ।। 33

कुछ तो खासियत है चाँद में ...                                                                              
जो उसको तेरी मिसाल देते हैं || 34 

थाली में चाँद दिखाकर , जिद पूरी तो कर ली ..
क्या हो जब बंद कमरे में , ये जिद जोर पकड़ जाये || 35

जब - जब तुझे करीब पाया 
इबादत ढ़ोंग सी लगी | 36 

घर से तो मैं चल था बरसात थमने पर ही |
रस्ते में आते - आते लेकिन बरस गया फिर || 37

जब तलाशा तुझे तो पाया नहीं |
जब पाया तो खुद को ही गुम पाया || 38

जहाँ तू नहीं वहीं तलाश खत्म हो जाती है |
जहाँ तू वहाँ ढूँढने की कोशिश ही न हुई || 39

इतनी दूर न निकल आते , जन्नत की तलाश में |
जो माँ के कदमों में बैठे होते, गोद में सर रख लिया होता || 40

यूँ ही चलता रहेगा सड़कों पर दौर ए इम्तहान |
नतीजा कब तलक न जाने बेनतीजा रहेगा !! 41

कभी जी चाहता है कि वक्त ठहर जाये , मगर मानता नहीं |
खैर उसकी अपनी फितरत है , मेरी अपनी फितरत || 42

जाने कहाँ से झगड़कर आया था बादल !
अपना दुखड़ा मेरे शहर आके रोया || 43

घर में हंगामा चलेगा , बहस नहीं |
बहस के लिये तो सारी सड़कें खाली हैं || 44

जीते - जीते दम निकल गया |
जिंदगी मगर बेदम ही रही || 45

चोर तुम भी , चोर हम भी |
आओ मिलकर चोर - चोर चिल्लाएँ || 46

पतंग की डोर ही नाजुक थी,
और हम हवाओं से उलझ बैठे | 47

झूठ चिल्लाता रहा पुरजोर , मगर हार गया |
सच खामोश रहा , फिर भी बाजी मार गया || 48

कोई फरार है नोटों भरा बोरा लेकर |
किसी ने जिन्दगी गुजार दी कटोरा लेकर || 49

नींद बेसबर हो बिस्तर पर इंतज़ार करती रह गई |
हम चाँद की चाँदनी के आगोश में ही सो गये || 50

मुझको होने लगी तेरे घर के आईने से जलन ।
रोज दीदार मेरे ख्वाब का करने लगा है ।। 51

तुम बातें बहुत अच्छी करते हो भीड़ देखकर ।
बस एक गिला है , दिल में नहीं उतरते ।। 52

बड़ी तेज चल रही है बदलाव की बयार ।
कोई समझे तो सही टोपी का इशारा ।। 53

वो इस अदा से हारे हैं बरखुरदार ।
तुम जीतकर भी  जरूर हार जाओगे ।। 54

तुम्हें देखूं और बस देखता जाऊँ ।
तुम सामने होते हो, वक़्त ठहरा सा लगता है ।। 55

कोई भेड़ सा, भेड़ नहीं हैं भेड़ों के बीच में ।
जो मिमियाने के साथ में काटने का हुनर रखता है ।। 56

शुरू हो गया है दुआओं का दौर ।
लगता है हुनर पर यकीं ना रहा ।। 57

ये सरपंची करते हैं या ढाबे में नौकरी ।
दही कोई भी फैलाये , सफाई में लग जाते हैं ।। 58

कौन मरता है मौत आने से !!
लोग मरते हैं जान जाने से । 59

जतन तो सुकून सँभालने को करता हूँ ।
दर्द तो मेरा पालतू है ।। 60

ये कलम तुम्हारी तलवार से कम नहीं ।
ध्यान रहे , पैर न कट जाये बेड़ियाँ काटते हुये ।। 61

पहाड़ से गिरा और उठ खड़ा हुआ ।
जो गिरा नजर से तो लकवा मार गया ।। 62

तोड़ सको तो बेहद कमजोर है , वरना बहुत मजबूत ।
जंजीर को ये राज पता नहीं है ।। 63

दिल में रखना आसान है 
रहना मुश्किल ।। 64

गुड़ छोड़ देना 
लेकिन छोड़ने का दावा ना करना ।। 65

मैं केवल लिखता हूँ ।
आप उस सार्थक बनाते हैं ।। 66

गोश्त खाना तो वो बहुत पहले छोड़ देता ।
छुरा आज फिसलकर उँगली  पर आया है ।। 67

आज वक़्त अधूरा हिसाब करने आया ।
मैंने कुछ और वक़्त की मोहलत दे दी ।। 68

तुम्हारी जीत तो शुरू से ही शक के घेरे में थी ।
ऊपरी माला जो गिरवी रख बैठे ।। 69

कोई आम कहकर चूसेगा ।
कोई काट खायेगा सेब कहकर ।
सबको अपनी सेहत की है ।
आम और सेब का दर्द क्या जानें !! 70

दुःख में भले ही काम न आये 
किन्तु सच्चा मित्र वही है जो ख़ुशी के मौके पर बहकने न दे ।। 71

कर्म और काम का अंतर समझिये 
कर्म में लीन रहें , काम में नहीं ।। 72

हर सच बताया नहीं जाता ।
हर झूठ छिपाया नहीं जाता ।। 73

खुद न करे 
कभी तुम्हें याद करने की नौबत आये ।। 74

काश ... टूटे दिल रिपेयर होते ।
तो रोज नए अफेयर होते ।। 75

गाड़ी के पहियों के बीच
 उचित दूरी भी जरूरी है ।। 76

खुदा मेरे महबूब को थोड़ी तो अक्ल बख्श ।
इत्र छिड़ककर जाते हैं , तस्वीर खिंचाने के लिये ।। 77

उसे दागदार चाँद की मिसाल पसंद है ।
दूधिया ट्यूबलाइट से चिढ जाती है ।। 78

मारने की वजह तो दुश्मनों को चाहिये ।
दोस्त तो यूं ही बेवजह क़त्ल करते हैं ।। 79

अनपढ़ लोगों के बच्चे तरक्की कर भी लें ।
लापरवाह माँ - बाप का कोई क्या करे !! 80

कितना मुश्किल है ना 
खुद के इन्सान होने का दावा करना ।। 81

इंसान मौत की प्रतीक्षा में जी रहा है ।। 82

दो ही तो स्वाद हैं हर खेल के ।
क्या हुआ आज फिर खटाई मेरे हिस्से आई !! 83

इस कैद से कभी रिहाई भी दे ।
या खुदा ! ठण्ड दे तो रजाई भी दे ।। 84

बस इसीलिये जंगल का कानून मुझे भाता है ।
वहाँ मुकदमों की तारीखें नहीं होतीं ।। 85

दुनिया अलाव जलाने लगी है ।
धूप भी भाव खाने लगी है ।। 86           
      वो इसीलिये हमको बाजार ले के जाती हैं ।
खरीदार के साथ पल्लेदार होना चाहिये ।। 87

ये माना कि फैशन हर रोज बदलता है ।
कुछ कपड़े केवल पुतलों पे अच्छे लगते हैं ।। 88

एक सबक लिया है साँप पालकर ।
अब दोस्त बनायेंगे देखभाल कर ।। 89  

दिल का जरा गुबार निकला , 
गुस्सा सरेबाजार निकला |
मज़लूम फिर लाचार निकला , 
मुल्जिम रसूखदार निकला || 90

ठहर गया तो जहर बन गया |
आँसू निकल जाता तो मोती होता || 91

वादा करने में कोई हर्ज नहीं |
बशर्ते वादा लिखा न जाय || 92

देखिये मशरूफियत का आलम |
वो हमसे खुद का नाम पूछते हैं || 93

फिर मेरे नाम की सुपारी दी गयी होगी |
फिर मेरे बटुए से एक तस्वीर ग़ायब है || 94

ये ठंड भी सियासतदानों की हमदर्द निकली |
बदइंतजामी का इल्जाम अपने सर ले लिया || 95

हम सितारे लगा आसमान ओढ लेते हैं |
उन्हें गर्म रजाई में ठंड लगती है || 96

गर कमी है तो कमी रहने दो |
इसे जन्नत न बनाओ , जमीं रहने दो || 97

दिल की बात करने लगा हूँ |
मुझे कुछ होगा तो नहीं !! 98

जाने क्यों ये मुल्क मेरा , जज्बात जगाये बैठा है !
जागो , दुश्मन सरहद पर घात लगाये बैठा है || 99

अम्मी रूठे , अब्बा रूठे |
कभी न पागल डब्बा रूठे || 100      
   ये लो हमने आँखों से गुफ्तगू शुरू कर दी ।
दीवारो  अपने कानों को आराम करने दो ।। 101    

अच्छा हुआ मौके पर धूल उड़ गयी |
आँसुओं को निकलने का बहाना मिल गया || 102

कुछ तो हेर - फेर हो गयी |
आज साँझ को देर हो गयी || 103

खुदाया नासमझ को हसीं न बनाया कर |
दिल बेवजह खामोशियों का जवाब ढ़ूँढ़ता है || 104

यूँ तो दिल बेउस्ताद है मेरा |
बेतालीम होकर भी , हर जगह नहीं लगता || 105

तुम इतने भी अच्छे न होते |
जो मैं इतना बुरा न होता || 106

कुछ सामान लपेटना है |
क्यों न अखबार खरीद लें || 107

कुरेद सको तो कुरेद लो |
जख्म अब भरने को है || 108

लड़ लेते तो शायद फतह भी हो जाती |
तुम तो शिकस्त के भी हकदार नहीं || 109 

अब हम भी अंदाजा लगा लेते हैं रफ्तार से |
कौन डरकर भाग रहा है , कौन भाग रहा है प्यार से !! 110
 तुम्हें मोहब्बत की जमानत चाहिये |
ये लो .....दिल गिरवी रखा || 111

आज को बुरा नहीं कहता , कल इतना अच्छा न था |
आज को अच्छा नहीं कहता, कल इतना बुरा न था || 112 

जो मुँह में आया , लिख रहे हैं छाप रहे हैं |
जैसे गोबर के थेपले थाप रहे हैं |
दिल पर नहीं छपते , किताबों के पुलिंदे |
हम सर्दियों में जलाकर ताप रहे हैं | 113

मंजूर है तुम्हारी खुशी के लिये |
"अच्छी लग रही हो ", ये झूठ बोलना || 114   
  
हाल - ए - दिल यूं बेबाक न कहा करो |
यहाँ दिलवाले वाले कम , सिरफिरे बहुत हैं || 115

जाते - जाते वो ऐसा जख्म दे गया |
मरहम करते - करते मर हम गये || 116

बड़े जतन से तुमने यहाँ जो दूब पाली है |
मेरे गाँव में इसी को बंजर कहते हैं || 117

तुम पहली बार भीगे हो ....छटपटाओ |
हम तो जब से भीगे हैं ....बस भीगे हैं || 118

तुम्हारा सब कुछ मेरा । मेरा सब कुछ तुम्हारा ।
काश ! यकीन भी हो जाता । बाकी सब लौटा देते । | 119

उन्हें खबर है कातिल आयेगा,
अपने इर्द - गिर्द मजबूत किला रखते हैं |
जनता तो भेड़ - बकरी है, 
कसाई के लिये दरवाजा खुला रखते हैं || 120

तन्हा होता हूँ, तुमसे खूब बातें होती हैं |
तुम साथ हो, जाने कहाँ अल्फ़ाज़ गुम हो जाते हैं || 121

कड़ी धूप , तेज बरसात में खयाल आया ।
मैं अब तलक छतरी की तरह इस्तेमाल आया ।। 122

ये चटककर कीचड़ सिर पर न उछालतीं |
जो चप्पलों को इतनी छूट न दी होती ! ! 123

मैं चल पड़ा टूटी हुई चप्पलें लेकर |
सफर में राहगीर नंगे पाँव भी मिले || 124

खाली हाथ दर से जाने नहीं देता |
हकीम खुदा से कमतर नहीं || 125

बेहिसाब मिले मेरे चाहने वाले |
ना चाहने वालों ने हिसाब रखा है || 126

फूल तेरे कोमल स्पर्श से पीला है |
पानी तेरी आँख के नम से गीला है || 127

एक ही झटके में गम निकल गया |
उफ़्फ़ ...जीते - जीते दम निकल गया || 128

पेड़ से डाली छुड़ा ले गयी |
आँधी बहुत कुछ उड़ा ले गयी || 129

तुम आज कहते हो कि बंदर काटता है ,
इसको शौक न था , ये हुनर तुमने सिखाया है |
पहले गोद में और फिर कांधे पर लेकर ,
लाड़ से तुम्ही ने इसे सर पर चढ़ाया है |  130          

बेतरतीब बरसना चाहती हैं आँखें |
बारिशों से कह दो छतरी तान लें || 131     

जो बच निकले , मचाएँ शोर |
जो पकड़ा गया , वही चोर || 132

गड़गड़ाए होते, इशारा किया होता !
संभलने का एक तो मौका दिया होता !! 133

पलकों पर एक दस्तक है |
आँखें बंद करके देखता हूँ कौन है !
दरवाजे पर होती तो खोलकर देखता |  134

तलवार म्यान में रही 
काम जबान कर गयी | 135

दोस्त सा दुश्मन , दुश्मन सा दोस्त |
सियासत में कुछ भी ख़रा नहीं होता || 136

भाषा बड़ी कमाल की
कर सोच - समझकर यूज |
खुशियाँ सबके लिये बनीं
कर खुशियों को चूज | 137

इतना भी नहीं अच्छा, हर बार माफ़ करना |
तेरी माफ़ियों के साथ मेरी गुस्ताखियाँ बढ़ी हैं || 138

कोई घुटने बचा सका , कोई वक़्त बचा सका |
दोनों भला कौन कम्बख्त बचा सका !! 139

छत पर चढ़ो , चाँद तो देखो |
किसी घसिआरिन की दराँती का हत्था टूट गया || 140

अँधेरा उनके घर होता है
जिनके बिजली का कनेक्शन हो |
ढिबरी वालों के घर की
कभी बिजली नहीं जाती | 141                          
                                                     ~ प्रवेश ~