मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, December 2, 2011

जरा संभल के !


जरा संभल के !

ऐ भोली - भाली चींटियों !

जरा संभल के,

यूं बेधड़क

पार न किया करो 

इस रास्ते को,

बरामदे में भी 

एक किनारा पकड़ लो

अपने आने - जाने के लिये |

माना कि

तुम्हारा भी हक है 

बेरोक - टोक 

सीना ताने 

इस रास्ते पर चलने का ,

मगर तनिक खयाल रखो 

अपने छोटे कद का 

और कतई न भूलो 

इस बात को कि 

यहाँ हर कोई 

नजरें झुकाकर नहीं चलता,

हर एक की नजर

जमीन पर नहीं है |

                                     "प्रवेश "

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