मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, November 10, 2011

जनता जागी है |


 जनता जागी है |

छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |

ये नहीं तुम्हारी दासी है ,

आजादी की अनुरागी है |


गोरों ने छोड़ दिया भारत ,

बस इसे आजादी मत समझो |

कालों ने कब्ज़ा जमा लिया ,

ये बात बड़ी दुर्भागी है |


जनता ने बिठाया गद्दी पर ,

तुम  सर्वेसर्वा बन बैठे |

ये भूल गए कि जनता भी ,

तुम लोगों की सहभागी है |


तुम तो महलों में बैठे हो ,

तुम्हें  ठण्ड की खबर नहीं |

अकड़ती देहों से पूछो ,

कि कितनी सर्दी लागी है |


कुर्सी के मद में चूर हो ,

घोड़े बेचकर सोये हो |

नींद की कीमत उनसे पूछो ,

जिनकी निंदिया भागी है |



लजीज खाना खाते हैं ,

तुम्हारे घर के कुत्ते भी |

रोटी क्या ? नहीं जानते हैं ,

जिनके पेट में अगन लागी है |


धब्बे से दिखने लगे हैं ,

तुम्हारे सफ़ेद कुर्तों पर |

अब पहचान होने लगी है ,

कितनों की  खादी दागी है |


छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |


                                       "प्रवेश "

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