मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, November 28, 2011

गर्व या ग्लानि !


गर्व या ग्लानि !


ये ईंट

जिस पर दिया जलाकर 

दबा दी गयी है , 

जमीन की सतह से 

दो गज नीचे ,

जिस पर बनना है 

तुम्हारे सपनों का महल |


इसे ग्लानि हो 

इस बात की 

कि जब चर्चा हो 

आपके आशियाने की,

और इसकी खूबसूरती की ,

इसकी बनावट की ,

तब इसका

कोई जिक्र न होगा ,

इसके बलिदान को 

कोई याद नहीं करेगा |


या 

गर्व महसूस करे 

कि कल

जो आलीशान इमारत 

तैंयार होगी इसकी पीठ पर,

जिसकी सुन्दरता की कहानी 

इतिहास रचेगी ,

उसके चिरंजीवी होने का 

श्रेय इसी ईंट को मिलेगा |

                                    "प्रवेश "

Friday, November 25, 2011

उसे तो बस लिखना है |


उसे तो बस लिखना है |

बिजली के झूलते तारो पर 

तपती लू के अंगारों पर 

नदिया के बहते धारों पर 

उसे तो बस लिखना है |


पराजित या विजेता पर 

अच्छे या बुरे नेता पर 

मानवता के प्रणेता पर 

उसे तो बस लिखना है |


जनता के उठते हाथों पर 

जनता पर पड़ती लातों पर

सरकारी चुपड़ी बातों पर 

उसे तो बस लिखना है |


संसद के संवादों पर 

झूठे सरकारी वादों पर 

गुणों पर और अपवादों पर 

उसे तो बस लिखना है |


पेड़ों से लटकते झूलों पर 

कागज़ पर जमती धूलों पर 

आगे - पीछे की भूलों पर 

उसे तो बस लिखना है |


कुदरत के अद्भुत रंगों पर 

भूखे प्यासों और नंगों पर

पल - पल होते दंगों पर 

उसे तो बस लिखना है |


दीवानों की चाहत पर 

वफ़ा पर और बगावत पर 

टूटे और दिल आहत पर 

उसे तो बस लिखना है |


प्रेमीजन की बातों पर 

धवल चाँदनी रातों पर

खुशियों पर , सौगातों पर 

उसे तो बस लिखना है |


उस पर किसी का जोर नहीं 

उसकी सोच का कोई छोर नहीं 

वो पक्ष - विपक्ष की ओर नहीं 

वो कवि है , रिश्वतखोर नहीं

उसे तो बस लिखना है |


                                "प्रवेश "

Wednesday, November 16, 2011

काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |


काश ! कि बचपन लौट के आता |

मैं फिर से बच्चा बन जाता |

काश कि बचपन लौट के आता |


कोई मुझको डांट लगाता ,

तो झट बाबा को बतलाता |

बाबा डांट लगाते जब तो ,

माँ के आँचल में छिप जाता |


मैं बस मेरे मन की करता ,

वश तो किसी का  चल नहीं पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


खेलता अपने ही साये से ,

तरह - तरह के नक्श बनाता |

कभी कूदता , कभी उछलता ,

हँसता कभी , कभी रूठ भी जाता |


कभी कृष्ण तो कभी सुदामा ,

और कभी राधा बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


राग - द्वेष न पास  फटकता,

दंभ - कपट न मन में होता |

ईर्ष्या - छल का ज्ञान न होता ,

न पापी भाव जहन में होता |


बच्चों में भगवान  सुना  है  ,

और मैं भी भगवन बन जाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |


सब अपने , अपने ही होते ,

कोई भी तब गैर न होता |

सारे मन के मीत ही होते ,

और किसी से बैर न होता |



केवल प्रेम की भाषा होती ,

नफरत क्या है , जान न पाता |

काश ! कि बचपन लौट के आता |

                                             

                                                        "प्रवेश "

Thursday, November 10, 2011

जनता जागी है |


 जनता जागी है |

छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |

ये नहीं तुम्हारी दासी है ,

आजादी की अनुरागी है |


गोरों ने छोड़ दिया भारत ,

बस इसे आजादी मत समझो |

कालों ने कब्ज़ा जमा लिया ,

ये बात बड़ी दुर्भागी है |


जनता ने बिठाया गद्दी पर ,

तुम  सर्वेसर्वा बन बैठे |

ये भूल गए कि जनता भी ,

तुम लोगों की सहभागी है |


तुम तो महलों में बैठे हो ,

तुम्हें  ठण्ड की खबर नहीं |

अकड़ती देहों से पूछो ,

कि कितनी सर्दी लागी है |


कुर्सी के मद में चूर हो ,

घोड़े बेचकर सोये हो |

नींद की कीमत उनसे पूछो ,

जिनकी निंदिया भागी है |



लजीज खाना खाते हैं ,

तुम्हारे घर के कुत्ते भी |

रोटी क्या ? नहीं जानते हैं ,

जिनके पेट में अगन लागी है |


धब्बे से दिखने लगे हैं ,

तुम्हारे सफ़ेद कुर्तों पर |

अब पहचान होने लगी है ,

कितनों की  खादी दागी है |


छोडो तख़्त - ओ- ताज को 

अब सोती जनता जागी है |


                                       "प्रवेश "

Monday, November 7, 2011

जोर नहीं !


जोर नहीं !


अनजाने हम भी एक गुनाह कर बैठे |

जो दिल की कसक को आह कर बैठे ||


वो तो दोस्ती के काबिल भी  न निकले |

और हम उन्हें हमराह कर बैठे ||


कभी चलते थे वो मेरे नक्श -ए- कदम पर  |

आज वो हमें ही गुमराह कर बैठे ||


उन्हें सँवारने में हमने उम्र गुजार दी |

वो जिंदगी हमारी तबाह कर बैठे ||


हमारा ही जोर न चला कमबख्त दिल पर |

जो मोहब्बत उन्हें बेपनाह कर बैठे ||

                                                                         
अनजाने हम भी एक गुनाह कर बैठे |

जो दिल की कसक को आह कर बैठे ||


                                           "प्रवेश "