मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Friday, October 21, 2011

फख्र फर्क का !


फख्र फर्क का !

कभी सोचता हूँ कि
फर्क करूँ
खुद में और 
उन जानवरों में 
जो मेहनत करते हैं 
दिन - रात 
केवल अपने 
और अपनों के 
पेट की खातिर |

मैंने देखा है 
चिड़िया को 
दूर तक जाते हुये
और दाना चुगकर 
अपने चूजों के 
मुँह में डालते हुये |

मैंने भटकते देखा है
कुतिया को भी 
रोटी और हड्डी की खोज में 
अपने पिल्लों के लिये |

बिल्ली को चूहे पर 
झपट्टा मारते देखा है 
और फिर ले जाते हुये 
चूहे को बच्चों के पास |

शेर के छोड़े हुये 
गोश्त के टुकड़ों पर 
टूट पड़ते देखा है 
लोमड़ियों और लकड़बग्घों  को |

और जब तुलना की है 
अपनी श्रेष्ठता की ,
तो कुछ अलग नहीं पाया 
इन जानवरों से  |

सुबह - सुबह निकलता हूँ 
मजदूरी करने और 
खाना जुटाने 
परिवार की खातिर ,
और शाम तक 
चार आधे पेटों के लिये 
इंतजाम कर पाता हूँ |

कभी अपने और 
अपनों के सिवाय 
कुछ सूझा ही नहीं ,
कुछ भी न कर सका 
जिससे साबित  कर सकूं 
अपनी श्रेष्ठता को 
और इंसान होने पर 
फख्र कर सकूं | 

                              "प्रवेश "

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