मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, October 8, 2011

पेड़ों की कटाई - भविष्य से खिलवाड़

पेड़ों की कटाई - भविष्य से खिलवाड़ 

काँधे पर कुल्हाड़ी
और आरा सजाये
कहाँ चल दिए !
पेड़ काटने या भविष्य !
आने वाली पीढ़ी की
अल्पायु का इंतजाम करने !
शौक से जाइये
मगर कल
शिकायत न करना
कि " गर्मी लम्बी खिंच गयी ,
मौसम ही नहीं बदला ,
जाने बरसात कब होगी !"
फिर नहीं मिलेंगे
उछलते - कूदते मृगशावक ,
आराम फरमाती शेरनी ,
पेड़ों से झूलते बन्दर
और जलक्रीड़ा करते गजराज |
तब चलाते रहना
इन्हें बचाने के अभियान पे अभियान |
ज़रा तो सोचो कि
जिसका घर उजाड़ दिया ,
उसे कहाँ पनाह दोगे |
इन्हें कंकरीट का जंगल
कतई नहीं भाता |
अगर इतना ही जरूरी है काटना ,
तो बहुत कुछ है काटने को |
जाँत - पात और वैमनस्य की
भावना को काटो |
उत्तरी और दक्षिणी
दुर्भावना को काटो,
और समूल काट डालो
रूढवादिता की उस खरपतवार को
जो पनपने नहीं देती
नयी सोच को , नयी पौंध को |
मगर पेड़ काटना ही
तुम्हें बखूबी  आता है |


                                         "प्रवेश "

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