मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Monday, September 26, 2011

क्या मैं जानता हूँ तुम्हे !


क्या मैं जानता हूँ तुम्हे !

एक नाकाम सी कोशिश करता हूँ 
तुम्हें समझने की ,
 जानने की ,
तुम्हें अच्छे से पहचानने की ,
कभी खुद ही
दावा करता हूँ 
कि मैं जान चुका हूँ ,
पहचान चुका हूँ ,
तुम्हें दिल की गहराइयों से |
कुछ नहीं रह गया 
अब जानने - समझने को ,
एक भ्रम सा होता है 
कि मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
तुम्हारी  आहट से ही  ,
तुम्हारा चेहरा पढ़ लेता हूँ |
अगले ही पल 
जाने क्यों
ऐसा लगता है 
कि तुम अन्जान हो
मेरे लिये ,
बस एक मामूली सी 
जान - पहचान है  हमारी |
एक गुजारिश है तुमसे 
दूर कर दो 
मेरी कश्मकश को ,
कि "क्या मैं जानता हूँ तुम्हें  !"

                                          "प्रवेश "

1 comment:

  1. ohh Pravesh.... kya baat
    bahaut hi badhiya likha hai tumne... dil ki kashmakash ko
    niceee

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