मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, September 17, 2011

ये दुनिया ऐसी ही है !

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं पर डोली उठती है ,
और कहीं पर उठें जनाजे |
किसी जगह मातम का क्रंदन ,
और कहीं पर बजते बाजे |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं खेल में हुई सियासत ,
कहीं सियासत बन गयी खेल |
उड़ते जहाज का पहिया फटता ,
खड़ी - खड़ी टकराती रेल |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई सबको अपना समझे ,
कोई अपनी ही दुनिया में मगन है |
कहीं सुधा प्रेम की बरसे ,
और कहीं ईर्ष्या की अगन है |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई कहे देश मेरा है (अधिकार जताना)
कोई खुद को देश का माने (कर्तव्य निर्वाह )
कोई देना न चाहे धेला ,
कोई चला सर्वस्व लुटाने |

ये दुनिया ऐसी ही है !

किसी को मेवों से नफरत है ,
कोई एक गास को तरसे |
चैन किसी को नहीं महल में ,
कोई खुश चतुर्दिक घर से |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं निरा सूखा पड़ा है ,
कहीं कहर बरपाती बाढ़ |
कहीं द्वेष और घृणा ही है ,
और कहीं प्रेम - प्रगाढ़ |

ये दुनिया ऐसी ही है ! 

                                   "प्रवेश "

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