मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Thursday, September 29, 2011

पश्चिमी हवायें

पश्चिमी हवायें 

डूबते हुये सूरज की 
बीमार, ललाम किरणों से 
आंशिक पीतिमा लिये 
उत्तर - पश्चिम से उठते हुये 
श्याम - पीत बादलों से 
एक उम्मीद सी जगी थी 
कि सरकते - सरकते 
ये घिर आयेंगे 
मेरे बंजर खेत के ऊपर 
और बरसायेंगे
नवीन जलधार 
ताकि उग सके 
एक नयी पौंध और 
तैयार हो स्वस्थ फसल |
लेकिन पश्चिम से ही आती हुई 
बेलगाम और अल्हड़ हवायें 
जिन्हें ना बहने की तहजीब 
ना ठहरने का तरीका 
या यूं कहें कि 
अमर्यादित हवायें 
उड़ा ले गयी 
मेरी उम्मीदों को |
उन रसभरी घटाओं संग 
खेत की सतह की 
मिट्टी भी उड़ चली |
निर्लज्ज हवाओं से 
मेरी उम्मीद हार गयी |



                               
पाश्चात्यता का प्रभाव उजागर करने का प्रयास किया गया है |

                                                                

                                             "प्रवेश "

Monday, September 26, 2011

क्या मैं जानता हूँ तुम्हे !


क्या मैं जानता हूँ तुम्हे !

एक नाकाम सी कोशिश करता हूँ 
तुम्हें समझने की ,
 जानने की ,
तुम्हें अच्छे से पहचानने की ,
कभी खुद ही
दावा करता हूँ 
कि मैं जान चुका हूँ ,
पहचान चुका हूँ ,
तुम्हें दिल की गहराइयों से |
कुछ नहीं रह गया 
अब जानने - समझने को ,
एक भ्रम सा होता है 
कि मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
तुम्हारी  आहट से ही  ,
तुम्हारा चेहरा पढ़ लेता हूँ |
अगले ही पल 
जाने क्यों
ऐसा लगता है 
कि तुम अन्जान हो
मेरे लिये ,
बस एक मामूली सी 
जान - पहचान है  हमारी |
एक गुजारिश है तुमसे 
दूर कर दो 
मेरी कश्मकश को ,
कि "क्या मैं जानता हूँ तुम्हें  !"

                                          "प्रवेश "

Friday, September 23, 2011

रास्ते का पत्थर

रास्ते का पत्थर 

वो ठोकरें खाता ,
मगर लोग गिर जाते |
किसी के जूते फट जाते ,
कोई अंगूठे पे चोट खाता ,
कोई मुँह के बल गिरता ,
किसी के दाँत गिर जाते |
कोई जो संभल कर चलता 
तो लाँघकर निकल जाता ,
अपनी ही धुन के मतवाले 
अक्सर चोट खा जाते |
कोई इतना नहीं करता 
कि झुककर उठा दे उसको ,
किनारे रख दे ताकि 
और कोई चोट न खाये |
मिटटी - पानी की संगत से 
वो जम चूका है अब वहीं, 
बिन आयास - आलम्ब के 
अब उखड सकता है नहीं |
जाने कितनी पीढियाँ
अभी और ठोकर खायेंगी !
उखाड़ फेंकेंगी उसे 
या लाँघकर ही जायेंगी |
वक़्त रहते रास्ते का 
वो पत्थर हटा दिया जाता ,
क्यों लाँघना होता उसे ,
क्यों बेवजह कोई चोट खाता !

                                                         "प्रवेश "

रूढ़िवादिता को रास्ते का पत्थर कहा गया है |

                                                                     

Saturday, September 17, 2011

ये दुनिया ऐसी ही है !

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं पर डोली उठती है ,
और कहीं पर उठें जनाजे |
किसी जगह मातम का क्रंदन ,
और कहीं पर बजते बाजे |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं खेल में हुई सियासत ,
कहीं सियासत बन गयी खेल |
उड़ते जहाज का पहिया फटता ,
खड़ी - खड़ी टकराती रेल |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई सबको अपना समझे ,
कोई अपनी ही दुनिया में मगन है |
कहीं सुधा प्रेम की बरसे ,
और कहीं ईर्ष्या की अगन है |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कोई कहे देश मेरा है (अधिकार जताना)
कोई खुद को देश का माने (कर्तव्य निर्वाह )
कोई देना न चाहे धेला ,
कोई चला सर्वस्व लुटाने |

ये दुनिया ऐसी ही है !

किसी को मेवों से नफरत है ,
कोई एक गास को तरसे |
चैन किसी को नहीं महल में ,
कोई खुश चतुर्दिक घर से |

ये दुनिया ऐसी ही है !

कहीं निरा सूखा पड़ा है ,
कहीं कहर बरपाती बाढ़ |
कहीं द्वेष और घृणा ही है ,
और कहीं प्रेम - प्रगाढ़ |

ये दुनिया ऐसी ही है ! 

                                   "प्रवेश "

Wednesday, September 14, 2011

हिंदी का पुट


हिंदी का पुट


आमजन की बोली में , हँसी में ठिठोली में 

दीन की पुकार में , नेता की जयकार में 

हिंदी का पुट है |



गृहस्थी के भोग में , जोगी के जोग में 

बहुत बड़े सोची में , सड़क के मोची में 

हिंदी का पुट है |



अनाड़ी की गाली में , महफ़िल ए कव्वाली में 

बोली में किसान की , शोध में विज्ञान की 

हिंदी का पुट है |



माँ के प्यार में , बाप के दुलार में 

राशन की दुकान में , सपनों की उड़ान में 

हिंदी का पुट है |



अनशन में - आन्दोलन में , घृणा में - सम्मोहन में 

गाड़ी में रेल में , प्रतिस्पर्धा और खेल में 

हिंदी का पुट है |


                                                           "प्रवेश "

Friday, September 9, 2011

मौसम का मिजाज !


मौसम का मिजाज !

कभी देखा है बदलते हुये मौसम का मिजाज !

नहीं अगर , तो कभी मेरे शहर में आइये |



इस तरह शाम ढले लुढ़कते हैं लोग ,

जैसे टेबल के कोने पे रखा , हिल जाये गिलास |



रोज ही लोग हलाल होते हैं बकरों की तरह ,

कौन रखता है भला इतनी लाशों का हिसाब |



बेआबरू होती हैं बेटियाँ , केले की तरह ,

जिस्म बिकते हैं सरेआम , कौड़ियों के हिसाब |


कभी देखा है बदलते हुये मौसमका मिजाज !!

                                                              "प्रवेश "

Thursday, September 8, 2011

वाह री मेरी पिलानी

वाह री मेरी पिलानी 

वाह री मेरी पिलानी 
सड़क में गड्ढे ही गड्ढे 
गड्ढों में पानी ही पानी 
वाह री मेरी पिलानी |

यूँ तो बहुत कुछ है ,
सभाओं में बोलने के लिए |
एक ही बारिश काफी है ,
पोल खोलने के लिए | 
सभाओं में सुनी जाती है 
कर्णप्रिय और अमृत बानी |
वाह री मेरी पिलानी |

सड़क में गाड़ियों से 
गड्ढों की संख्या ज्यादा है |
अगले चुनाव से पहले 
सड़क सुधारने का भी वादा  है |
कथनी से करनी की 
है रंजिश बड़ी पुरानी |
वाह री मेरी पिलानी |

कहीं कूड़ा , कहीं कीचड 
ख़बरें भी हैं अख़बारों में |
साफ़- सफाई के अनगिनत 
फायदे  भी हैं इश्तहारों  में |
ये  सब सच है, मिथ्या नहीं ,
समझें न मनगढ़ंत कहानी |
वाह री वाह , वाह री वाह ,
वाह री मेरी पिलानी |

                                         "प्रवेश "

Monday, September 5, 2011

शिक्षक

शिक्षक 

जान फूँक दे पत्थर में 
और जड़ को चेतन कर दे |
सच्ची राह दिखाकर वो 
निश्छल , निर्मल मन कर दे |

हों अगर निराश कभी 
वो फिर से आस जगाता है |
पस्त होते हौंसलों में 
आत्मविश्वास जगाता है |

स्नेहमय ह्रदय कभी है .
कभी कठोर व्यव्हार भी |
दण्डित भी करता है वही ,
देता है अगणित प्यार भी |

मानवता का परम मित्र 
धर्म का सच्चा रक्षक है |
भगवान  से भी ऊँचा दर्जा 
मिलता है जिसे वो शिक्षक है |

केवल पुस्तक पढ़ाने  वाला 
महज एक अध्यापक है |
जीने की कला सिखाने वाला ,
सच्चे अर्थों में शिक्षक है |

                                  "प्रवेश "