मेरा गद्य ब्लॉग - सोच विचार

Saturday, August 27, 2011

क्यों बड़ा हो गया !


क्यों बड़ा हो गया !


कितने अच्छे दिन थे वो 

जब सच - झूठ का पता न था |

एहसास ख़ुशी - गम का न था ,

छाँव - धूप का पता न था |



जो भी होता , अच्छा होता ,

कुछ बुरा कभी होता न था |

रूह कभी दुखती न थी ,

मन कभी रोता न था |



रोने की वजह मालूम न थी |

हँसने का कारण पता न था ,

सब अपने थे, न पराया कोई ,

कभी राग - द्वेष में फंसा न था |



क्यों होश संभाला मैंने और 

क्यों लगा समझने खुशियाँ - गम |

क्यों घृणा - प्रेम के भाव जगे ,

क्यों समझ आया रहम - ओ- सितम |



क्यों चलने लगा दुनिया के संग ,

क्यों कन्धा मिलाकर खड़ा हो गया !

क्यों बचपन छोड़ गया मुझको ,

जाने क्यों मैं बड़ा हो गया !!

                                           "प्रवेश "

Friday, August 19, 2011

रुक जाना नहीं


रुक जाना नहीं

उठो , जागो , आगे बढ़ो 

अब कदम रुकने पाये ना ,

बेईमान ठेकेदारों के सम्मुख 

मस्तक ये झुकने पाये ना |



अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है ,

सब जानकर यदि मौन हो ,

तंत्र को बुरा या भला 

कहने वाले फिर कौन हो !



न बंद नयनों को करो ,

पर  जोश  पर लगाम हो ,

सजग हर इन्द्री रहे ,

मन को नहीं विश्राम हो |



कुछ न  हो , एक जुनूं हो 

अन्याय के प्रतिरोध का ,

सच्ची लगन सच की तरफ ,

न भाव हो प्रतिशोध का |



संघर्ष आज का तुम्हारा 

व्यर्थ जायेगा नहीं ,

ऐसे पावन यज्ञ का फिर 

मुहूर्त आयेगा नहीं |
                                          

                                    "प्रवेश "

कीचड़ के छींटे !

कीचड़ के छींटे !

बरसात का मौसम है ,
बरसाती बात कहता हूँ |
जो आज घटी मेरे संग ,
वो वारदात कहता हूँ |

जलमग्न और अधपकी सड़क पर 
मैं साईकिल पर सवार था |
एक मनचले चौपहिये वाले को 
अय्याशी का बुखार था |

उस जलमग्न खंडित सड़क पर 
उसकी जो रफ़्तार थी |
मेरे संग दुआ थी आपकी ,
रहमत परवरदिगार की |

मगर मेरी पतलून पर 
कीचड़ के छींटे आ गये |
और मेरे मस्तिष्क में 
एक प्रश्न सा जगा गये |

व्यवस्था - विकास - व्यवहार का 
असर चैन - ओ - सुकून पर |
कीचड़ के छींटे कहाँ पड़े ,
इन तीन पर या पतलून पर |


                                            "प्रवेश "

Tuesday, August 9, 2011

जबान की सफाई


जबान की सफाई 

कभी -कभी तो साँसों में 
इतनी बदबू आती है ,
खुशमिजाज महबूबा भी 
पल में बेरूख हो जाती है |

साँसों की बदबू मिलन को 
पल में कर दे जुदाई ,
इसीलिये जरूरी है ,
जबान की सफाई |

जबान की गन्दगी से 
चरित्र से भी बू आती है ,
महफ़िल में रुसवा होते हैं ,
इज्जत रफू हो जाती है |

भाई को दुश्मन बना दे 
दुश्मन को बना दे भाई ,
निहायत ही जरूरी है ,
जबान की सफाई |

                             "प्रवेश "

Tuesday, August 2, 2011

बिल



बिल 



आस्तीन में रहने वाले ,

चले हैं नया बिल बनाने |


कैसा होगा बिल का ढांचा ,

झूठा हँसेगा , फँसेगा सांचा |


निकल पायेगा यहाँ से कौन ,

जो बिल निर्माण में रहेगा मौन |


जिसने भी आवाज उठाई ,

मार डालेंगे उसे कसाई |


जो भी करेगा बिल की बात ,

रखे याद चार जून की रात |


बाहर है तबला , अन्दर ताल ,

देखें क्या होगा बिल का हाल !

                                             "प्रवेश "